सतपुड़ा सी वादियाँ छोटे-मोटे अबूझमाड़ रहने दो ! इन्हीं के बदौलत है जल चक्र धरा पर अषाढ़ रहने दो !!

सरगुजा संवाददाता – अजय गौतम

आषाढ़सये प्रथम दिवस के अवसर पर रामगढ़ महोत्सव में हुआ सरस कवि-सम्मेलन का आयोजन

अम्बिकापुर। जिला प्रशासन सरगुजा और आयोजन समिति, रामगढ़ महोत्सव के तत्वावधान में रामगढ़ में सरस कवि-सम्मेलन का आयोजन किया गया। दूर-सूदूर से आए श्रोताओं ने देर शाम तक कवियों द्वारा प्रस्तुत रामकाव्य की सरिता में अवगाहन किया। और आयोजन की मुक्तकंठ से सराहाना की। कार्यक्रम का काव्यमय शानदार संचालन कवि संतोष दास सरल ने किया।

कवि-सम्मेलन के प्रारंभ में वरिष्ठ कवि डा. सपन सिन्हा ने अपने काव्य में केंवट, शबरी, जटायु – जैसे राम के सहायकों के प्रति प्रणम्य भाव प्रदर्शित किया – केंवट के नाव को नमन मेरा, शबरी के भाव को नमन को मेरा, जो दशानन से है लड़ा पहले, जटायु गिद्ध को नमन मेरा। जहां प्रभु रामजी पधारे थे, रामगढ़ गांव को नमन मेरा। रामगढ़ जाने की तैयारी व उत्साह वरिष्ठ कवि एसपी जायसवाल की कविता में दृग्गोचर हुआ – हालु उसरा नोनी कर दाई, चल दुनों झन रामगढ़ जाई। आएज हवे पहिला अषाढ़, रामगढ़ में मेला लागही। तम्बू-कनाथ अउ बड़े-बड़े कर डेरा लागही। रिकिम-रिकिम कर दुकान खाए-पीए बर मिलही। कविवर डां. योगेन्द्र गहरवार ने रामगढ़ की महिमा का सुंदर बखान किया – इस पर्वत पर मेरे रामजी के जीवन का कुछ पल बीता है। मेरे लिए हर पत्थर लक्ष्मण, यहां की रज-रज सीता है। कवयित्री राजलक्ष्मी पाण्डेय ने रामगढ़ को ऐतिहासिक बताया – मैं रामगढ़ की भूमि हूं, रामचन्द्र निवास किए लखन-जानकी साथ लिए। पुरातात्विक हूं, ऐतिहासिक हूं, सांस्कृतिक हूं, आध्यात्मिक हूं। वृक्षों के अभाव में पृथ्वी में निरंतर होती जल की कमी का दर्द कवि विनोद हर्ष की कविता में मुखरित हुआ – सतपुड़ा-सी वादियां, छोटे-मोटे अबुझमाड़ रहने दो। बदौलत इन्हीं के हैं जलचक्र, धरा पर आषाढ़ रहने दो।
कवयित्री पूनम दुबे ‘‘वीणा’’ ने भगवान राम के हृदय में निवास करने का समुल्लेख किया – अंतस मन-मंदिर मेरे रहते हैं सियाराम, करती उन्हें प्रणाम! कवि अंचल सिन्हा ने भी यही बात कही – रहे अवध या रामजी, या रहें चद्रखुरी के धाम। मेरे हृदय में बसते हैं श्रीराम! निष्काम कर्म की प्रेरणा कवयित्री अनिता मंदिलवार ने अपने दोहे में दी – नश्वर यह संसार है, काम करो निष्काम, कहां खोजते फिर रहे, मन में ही हैं राम। कवयित्री सीमा तिवारी ने भगवान राम के स्वागत का निवेदन किया – मेरे राम आ गए हैं, दर्शन तो कीजिए। कृतार्थ हो के दिल से, वंदन तो कीजिए। कवि संतोष सरल ने सभी भक्तों से अयोध्या चलने का आग्रह किया – चलो चलें अयोध्या भक्तों, उनका निमंत्रण आया है। मेरे साथियों रामलला ने बुलाया है! मुझे जाना है। जय सियाराम, जय-जय सियाराम!

कवि-सम्मेलन में दोहों के साधक कविवर मुकुन्दलाल साहू ने अपने दोहे में भगवान राम के प्रति अपनी अनन्य भक्ति निष्ठा व्यक्त की – मन में रहते हो तुम्हीं, भजूं तुम्हारा नाम। राम तुम्हीं से वास्ता, मुझे तुम्हीं से काम।

कार्यक्रम में अजय शुक्ल ‘‘बाबा’’ ने महाकवि कालिदास द्वारा रामगढ़ में विरचित विश्वप्रसिद्ध कृति ‘‘मेघदूतम्’’ को एक उपहार बताया – मेघ चले संदेश ले, सुनो प्रिया के द्वार। मेघदूत के रूप में मिला हमें उपहार। इनके अलावा कवयित्री मीना वर्मा की कविता – गुनाह बस एक था, यक्ष की थी भूल, यक्षिणी की प्रीत में, रीत गया भूल, कवि कृष्णमोहन निगम की – सृजन राम का करती है जो शुभ रामत्व जगाती है, युगों बाद कौशल्या-सी जननी जग को मिल पाती है, कवि राजेश पाण्डेय की रचना – मुस्कुराना जिंदगी है, मुस्कुराइए, गमी हो कोई तो उसको भूल जाइए, गीतकार देवेन्द्रनाथ दुबे का गीत – समय की कीमत जान जगत में, समय बड़ा बलवान, समय की उंगली पकड़ के चलना, कभी न सीना तान, गीतकार कृष्णकांत पाठक का गीत – तुझसे मिलने की आरजू देखो मैं कहां से कहां चला आया, प्रकाश कश्यप की छत्तीगढ़ी दोहा – राम नाम सच्चा हवय, है झूठा संसार, जे एतना जानिस इहां, तेकर बेड़ा पार, ओज के कवि अम्बरीष कश्यप की कविता – किसी के नाम से सीखो, किसी के काम से सीखो, चरित्रवान होने को मर्यादा राम से सीखो और कवि अजय सागर की कविता – इस रामगढ़ी पर्वत पे वो रचना कालजयी आई, जो दुनियाभर में मेघदूत बनके दुनिया को हरषाई और कवित जयंत खानवलकर की भक्ति रचना – राम दुआरे आएंगे, हम सपने नए सजाएंगे, आषाढ़ के प्रथम दिवस में मंगल गान गाएंगे – को श्रोताओं ने खूब सराहा। अंत में शायर-ए-शहर यादव विकास की प्रेरणदायी गजल से कवि-सम्मेलन का यादगार समापन हुआ – फिर किसी ने गजल सुनाई है, कलि गुलशन में मुस्कुराई है। अब जिंदगी में कोई फिक्र नहीं, फिक्र कपड़े उतार आई है। आयोजन को सफल बनाने में जिला परियोजना अधिकारी गिरीश गुप्ता, जिला मिशन समन्वयक रवि तिवारी और जिला शिक्षा अधिकारी अशोक कुमार सिन्हा का योगदान बहुत सराहनीय रहा।

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