समर्पित है ; मां कैसे सब कर लेती है ; जो खुद निरक्षर होकर भी सारे जग को पढ़ लेती है ; माँ के प्रति हमारी प्रशंसा और आदर: आयुष सिंह चंदेल
देखकर मुझे पीड़ा में वह भी पीड़ित हो जाती थी।
देख मुझे नैराश्य में वो ढाढ़स देकर समझाती थी।।
जतन लाख मैं करूँ भले कुछ भी न उसे बतलाने की।
मेरे मन की सारी बातें जाने कैसे वो पढ़ लेती थी।।
बचपन से लेकर अब तक, बड़ा हुआ मैं उसके साथ।
कितने आशीष छुपे थे भीतर, उसके ममता वाले हाथ।।
थोड़ा भी बेचैन हुआ तो दर्द मेरे पढ़ लेती थी।
मेरे सिर पर फेर उंगलियाँ दर्द मेरे हर लेती थी।।
इक दिवस की बात कहा, “मैं दूर जा रही हूँ तुझसे”।
अब तू खीरद – मंद हो गया जीवन जीना है खुद से।।
उस दिन समझ लिया था मैंने, माँ कैसे सब कर लेती थी।
जो खुद निरक्षर होकर भी सारे जग को पढ़ लेती थी।।
आयुष सिंह (नौसिखिया कवि)
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