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नाग पंचमी : आस्था, प्रकृति और परंपरा का संगम

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नाग पंचमी हिन्दू धर्म का एक पावन पर्व है, जो हर वर्ष सावन मास की शुक्ल पक्ष की पंचमी तिथि को मनाया जाता है। यह पर्व नागों (सर्पों) की पूजा और उनके प्रति सम्मान प्रकट करने का प्रतीक है। इस दिन महिलाएं विशेष रूप से व्रत रखती हैं और नाग देवता की पूजा कर अपने परिवार की सुख-शांति और रक्षा की कामना करती हैं।

पौराणिक महत्व:
नाग पंचमी का संबंध कई पौराणिक कथाओं से जुड़ा है। एक कथा के अनुसार, महाभारत काल में जब जनमेजय ने अपने पिता परीक्षित की मृत्यु का बदला लेने के लिए नाग यज्ञ किया था, तब आस्तिक ऋषि ने यह यज्ञ रोक दिया था। उसी दिन को नागों की रक्षा और सम्मान के रूप में नाग पंचमी मनाई जाती है।

पूजा विधि:
इस दिन लोग नाग देवता की मूर्ति या चित्र की पूजा करते हैं, उन्हें दूध, कुशा, अक्षत, दूर्वा और पुष्प अर्पित करते हैं। कई जगहों पर मिट्टी के नाग बनाकर उनकी पूजा की जाती है। कुछ क्षेत्रों में सांपों को सीधे दूध पिलाने की भी परंपरा है, हालांकि अब पर्यावरणविद् इसे हानिकारक मानते हैं।

प्राकृतिक महत्व:
सर्प पर्यावरण संतुलन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। वे खेतों और घरों में चूहों और अन्य कीटों की संख्या नियंत्रित करते हैं। नाग पंचमी न केवल धार्मिक महत्व रखती है, बल्कि यह जीवों के साथ सहअस्तित्व और प्रकृति की रक्षा का संदेश भी देती है।

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