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गाय की व्यथा – एक मूक जीवन की गूंज

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जांजगीर चांपा संवाददाता – राजेन्द्र जायसवाल

यह तस्वीर एक गाय की व्यथा को दर्शाती है, जिसमें गाय मानवीय समाज से अपनी पीड़ा, योगदान और आज के समय में उपेक्षा को शब्दों में बयां कर रही है। यह न केवल भावनात्मक रूप से झकझोरती है, बल्कि सामाजिक और सांस्कृतिक चेतना पर भी गहरा प्रश्न खड़ा करती है।

जांजगीर चांपा में गायों की स्थिति बहुत ज्यादा गंभीर है आने वाले पीढ़ियों में गायों की खोज बिन किताबों में होगा और भरी बरसात के मौसम में एक एक दिन रात कैसे व्यतीत हो रहे हैं गायों को ही पता l  गायों की दयनीय दशा को देखकर छत्तीसगढ़ सरकार को तत्काल संज्ञान लेने की आवश्यकता है गायों की सुरक्षा हेतु सरकार शासन प्रशासन की जिम्मेदारी होनी चाहिए

गाय की व्यथा – एक मूक जीवन की गूंज

“मैं जाऊं तो जाऊं कहां?” — यह प्रश्न एक ऐसी जीवात्मा का है जिसने हजारों वर्षों से मानव सभ्यता को पोषित किया, पर आज उसी मानव समाज से उपेक्षित और अपमानित महसूस कर रही है। यह लेख उसी मूक प्राणी गाय की पीड़ा की गूंज है, जो हमारी संस्कृति, धर्म और आस्था का प्रतीक होने के बावजूद आज खुद के अस्तित्व की लड़ाई लड़ रही है।

गाय का ऐतिहासिक योगदान:

गाय न केवल भारत में पूजनीय रही है, बल्कि कृषि-प्रधान समाज की रीढ़ भी रही है। इसके दूध, दही, घी, मट्ठा, गोबर और मूत्र तक हर चीज़ ने मानव समाज को लाभ पहुंचाया है।

दूध और दुग्ध उत्पाद – मानव की शारीरिक पोषण का आधार

चमड़ी, हड्डी, गोबर और मूत्र – औद्योगिक, कृषि और आयुर्वेदिक उपयोग

खेती में बैल – पुराने समय में बैलों ने ट्रैक्टर और मशीनों की जगह ली

गोबर से ईंधन और खाद – अब भी ग्रामीण भारत का अभिन्न हिस्सा


आज की स्थिति: उपेक्षा और पीड़ा

जहां एक ओर गाय को ‘गौमाता’ कहा जाता है, वहीं दूसरी ओर सड़कों पर भूखी-प्यासी, कचरा खाने को मजबूर गायें हमारे समाज की संवेदनहीनता का प्रतीक बन चुकी हैं।

खेतों से खदेड़ा जाता है

घरों से निकाल दिया जाता है

सड़क पर गली-गली मारी-मारी फिरती है

कई गायों सड़क हादसे में मर रहे हैं आए दिन रोजाना की बात है

दुर्घटनाओं और प्लास्टिक से मौतें होती हैं

कई जगहों से तस्करी भी किया जा रहे और कई जगहों से कार्यवाही भी किया गया

गायों की प्रति संवेदनशील बने और गायों की रक्षा करें

यह स्थिति एक ऐसी विडंबना है जहां एक ओर गाय की पूजा होती है, और दूसरी ओर वही गाय भूख और पीड़ा से तड़पती है। छोड़ दिया गया है

पालतू पशुओं की बदलती प्राथमिकता:

आज लोग गाय से अधिक कुत्तों को पालने लगे हैं। शहरीकरण और आधुनिक जीवनशैली में गाय के लिए जगह नहीं रही, जबकि कुत्तों को घर के सदस्य की तरह रखा जा रहा है। गाय जो कभी जीवनदायिनी थी, अब केवल त्यागी हुई मूक पीड़िता बन चुकी है।

 

गाय की अपील आम जनता से

> “मेरी चमड़ी, मेरी हड्डी, मेरा मूत्र, मेरा गोबर — सब कुछ इंसान को समर्पित रहा, पर अब मुझे कोई नहीं पूछता। लोग मुझसे नफरत करते हैं। मुझे मारते हैं, कभी-कभी खा भी जाते हैं। मेरी व्यथा को कोई नहीं सुन रहे।”

 

समाज से अपील:

गाय की उपयोगिता केवल धार्मिक नहीं, वैज्ञानिक और सामाजिक भी है।

सरकार और समाज को मिलकर गौ संरक्षण के लिए ठोस प्रयास करने चाहिए।

गौशालाएं, सड़क सुरक्षा, प्लास्टिक मुक्त अभियान और जन जागरूकता जैसे कदम अनिवार्य हैं।

प्रत्येक नागरिक को चाहिए कि वह अपने आसपास की गायों के लिए संवेदनशील हो।

गायों के लिए जो गौठान बना है चारा पानी की व्यवस्था किया जाए

हर जगह पानी की व्यवस्था किया जाए और किसी के घर पर आए तो एक रोटी अवश्य दे

कुत्तों को पालना बंद करें गायों की थोड़ा सोच और समझे और पालन करेगा

गायों के लिए सुरक्षा व्यवस्था का इंतजाम शासन प्रशासन को करनी चाहिए

गायों की आज रक्षा नहीं तो कल विलुप्त होने में कोई देर नहीं

गाय केवल एक जानवर नहीं, वह हमारी संस्कृति की जीवंत प्रतीक है।

गाय केवल एक जानवर नहीं, वह हमारी संस्कृति की जीवंत प्रतीक है। यदि हमने उसकी पीड़ा नहीं सुनी, तो वह दिन दूर नहीं जब आने वाली पीढ़ियाँ केवल किताबों में ‘गौमाता’ पढ़ेंगी और सड़कों पर उसकी करुण पुकार को कभी न जान सकेंगी। आइए, हम एकजुट होकर गाय के सम्मान, सुरक्षा और सेवा की दिशा में कदम बढ़ाएं।

“आप अवश्य सुनेंगे” — यह गाय की अंतिम पुकार है। क्या हम सच में सुनेंगे?

 

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