रविंद्रनाथ टैगोर, जिन्हें ‘गुरुदेव’ के नाम से जाना जाता है, न सिर्फ एक महान कवि थे, बल्कि एक दार्शनिक, संगीतकार, चित्रकार, और समाज सुधारक भी थे। 7 अगस्त 1941 को उन्होंने इस दुनिया को अलविदा कहा, लेकिन उनकी रचनाएं आज भी हमारे विचारों, भावनाओं और संस्कृति को दिशा देती हैं।
टैगोर पहले एशियाई थे जिन्हें साहित्य में नोबेल पुरस्कार (1913) से सम्मानित किया गया। उनकी काव्यरचना गीतांजलि ने उन्हें वैश्विक मंच पर ख्याति दिलाई। उन्होंने भारत और बांग्लादेश के राष्ट्रगान भी रचे — जन गण मन और आमार सोनार बांग्ला।
उन्होंने शांति निकेतन और विश्व भारती विश्वविद्यालय की स्थापना कर शिक्षा के क्षेत्र में क्रांति लाई। टैगोर का मानना था कि शिक्षा केवल अकादमिक ज्ञान नहीं, बल्कि प्रकृति, कला और जीवन के साथ जुड़ाव है।
उनकी कहानियाँ, जैसे काबुलीवाला, द पोस्टमास्टर, और नष्टनीड़, समाज के गहरे मुद्दों को मानवीय संवेदनाओं के साथ उजागर करती हैं।
आज उनकी पुण्यतिथि पर हम उन्हें नमन करते हैं और उनके विचारों को जीवन में अपनाने का संकल्प लेते हैं। टैगोर की रचनाएं हमें यह सिखाती हैं कि सच्चा साहित्य वह है जो आत्मा को स्पर्श करे और समाज को सजग बनाए।









