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भैरमगढ़ अभ्यारण्य क्षेत्र में एक तेंदुए की नहीं, सिस्टम की हुई है मौत!

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बस्तर संवाददाता – अर्जुन झा

अफसरों की कार्यप्रणाली सवाल सवालों के घेरे में 
 4 दिन तक तड़पता रहा घायल तेंदुआ, वन विभाग ने नहीं ली कोई सुध 

जगदलपुर। बस्तर संभाग के इंद्रावती टाइगर रिजर्व में मौत एक तेंदुए की नहीं, बल्कि बेपरवाह सिस्टम की हुई है। टाइगर रिजर्व क्षेत्र के भैरमगढ़ अभ्यारण्य में तेंदुए की मौत ने वन विभाग के अफसरों और इंद्रावती टाइगर रिजर्व प्रबंधन की कार्यप्रणाली को सवालों के घेरे में ला दिया है। यह तेंदुआ घायल हालत में चार दिन तक करहता, तड़पता पड़ा रहा, मगर किसी भी अफसर या कर्मचारी ने उसकी सुध नहीं ली। अगर समय रहते रेस्क्यू कर तेंदुए का इलाज शुरू कर दिया गया होता तो उसकी जान बचाई जा सकती थी। इससे जाहिर होता है कि जिम्मेदार लोग जंगलों में गश्त नहीं करते।
बस्तर संभाग के बीजापुर जिले में स्थित इंद्रावती टाइगर रिजर्व के भैरमगढ़ अभयारण्य की पहाड़ियों में एक तेंदुए की मौत हो गई। तेंदुआ जख्मी हालत में था और चार दिन से झाड़ियों के बीच तड़पते, कराहते पड़ा था। टाइगर रिजर्व के अधिकारियों ने पहली नजर में माना है कि आपसी लड़ाई में यह तेंदुआ घायल हुआ रहा होगा, मगर पोस्टमार्टम से ही स्पष्ट होगी।

माटवाड़ा से लगे जंगल में स्थानीय लोगों ने जब तेंदुए का शव देखा, तब वन विभाग को सूचना दी। मौके पर पहुंची टीम ने शव को कब्जे में लेकर जांच शुरू की। प्रथम दृष्टया संकेत हैं कि तेंदुआ किसी अन्य तेंदुए के साथ संघर्ष में घायल हुआ था। इंद्रावती टाइगर रिजर्व के डिप्टी डायरेक्टर संदीप बलगा के अनुसार, तेंदुए के शरीर पर चोट के पुराने निशान मिले हैं, जिससे यह अनुमान लगाया जा रहा है कि यह दो तेंदुओं के बीच हुई झड़प का नतीजा हो सकता है। पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट के बाद ही मौत की असली वजह साफ हो पाएगी। वही दूसरी ओर इस घटना ने वन्यजीव संरक्षण और जंगलों में निगरानी तंत्र की गंभीर खामियों को उजागर कर दिया है। सवाल यह भी है कि जब ग्रामीणों ने घायल तेंदुए के झाड़ियों में पड़े होने की सूचना वन विभाग को पहले ही दे दी थी, तो क्या समय रहते कोई कार्रवाई की गई? अगर की गई, तो क्यों तेंदुआ असहाय हालत में तड़पता रहा? इससे यह सवाल भी तैर रहा है कि क्या टाइगर रिजर्व और वन विभाग के अधिकारी कर्मचारी रिजर्व क्षेत्र और जंगलों में गश्त नहीं लगाते? यह घटना केवल एक तेंदुए की मौत नहीं है, यह वन्यजीवों के प्रति उदासीनता का जीवंत प्रमाण है। यह बताता है कि जब तक संवेदना को कार्रवाई में नहीं बदला जाएगा, तब तक जंगलों की शांति में ऐसे मौन मातम गूंजते रहेंगे।

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