कोरबा। आज भाद्रपद शुक्ल पक्ष की अष्टमी तिथि को राधा अष्टमी मनाई जा रही है। यह दिन श्रीकृष्ण की प्राणप्रिया और भक्ति की स्वरूपिणी राधा रानी के प्राकट्य दिवस के रूप में विख्यात है। वैष्णव परंपरा में राधा का पूजन सर्वोच्च स्थान रखता है। संतों के अनुसार जब श्री नारायण के मोहिनी अवतार पर सब मोहित हो गए तब केवल सूर्य देव थे जिन्होंने उस रूप पर वात्सल्य प्रकट किया l नारायण ने सूर्य देव के इस भाव पर प्रसन्न होकर उनकी पुत्री स्वरुप में धरती पर अवतार लेने का वरदान दिया l श्री कृष्ण अवतार लेने पर राधा रानी के रूप में श्री कृष्ण की आह्लादिनी शक्ति ही प्रकट हुई l वहीँ राधा रानी को जगत की मूल आधार शक्ति भी माना जाता है l
राधा रानी का नाम और स्वरूप
शास्त्रों में राधा के नाम को मंत्रस्वरूप माना गया है। कहा गया है कि कृष्ण का नाम जपने से भी पहले यदि “राधा” का स्मरण कर लिया जाए तो साधक को शीघ्र ही भगवान की कृपा प्राप्त होती है। “राधा” शब्द स्वयं ‘आराधना’ से निकला है, जिसका अर्थ है – वह शक्ति जिसके बिना भगवान की पूजा अधूरी है।
राधा रानी के 28 नाम : राधा, रासेश्वरी, रम्या, कृष्णमत्राधिदेवता, सर्वाद्या, सर्ववंद्या, वृंदावनविहारिणी, वृंदाराधा, रमा, अशेषगोपीमंडलपूजिता, सत्या, सत्यपरा, सत्यभामा, श्रीकृष्णवल्लभा, वृषभानुसुता, गोपी, मूल प्रकृति, ईश्वरी, गान्धर्वा, राधिका, आरम्या, रुक्मिणी, परमेश्वरी, परात्परतरा, पूर्णा, पूर्णचन्द्रविमानना, भुक्ति-मुक्तिप्रदा और भवव्याधि-विनाशिनी. इन नामों का जाप करने से भक्त की मनोकामनाएँ पूरी होती हैं और उसे मानसिक शांति व सकारात्मक ऊर्जा प्राप्त होती है.
विशेषता और महिमा
राधा को भक्ति की देवी माना जाता है।
उनका प्रेम कृष्ण के प्रति केवल लौकिक नहीं, बल्कि आत्मा और परमात्मा के मिलन का प्रतीक है।
वे शक्ति तत्त्व हैं, जिनके बिना कृष्ण की लीला अपूर्ण मानी जाती है।
हर पूजा में पहले राधा का नाम लेकर फिर कृष्ण का स्मरण करना परंपरा है।
पूजन की परंपरा
इस दिन भक्तजन उपवास रखते हैं और राधा-कृष्ण का पूजन करते हैं। पुष्प, माखन-मिश्री और सुगंधित वस्त्रों से उनकी आराधना की जाती है। बरसाना और वृंदावन में तो इस अवसर पर विशेष आयोजन होते हैं, जहां भजन-कीर्तन और झांकियों के माध्यम से राधा-कृष्ण की लीलाओं का स्मरण किया जाता है।








