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मानसिक और आर्थिक शोषण से त्रस्त व्याख्याता ने मांगी इच्छा मृत्यु

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जांजगीर-चांपा संवाददाता राजेन्द्र जयसवाल
बी, पी,प्रभारी प्राचार्य पर लगे गंभीर आरोप, शिक्षा विभाग की मर्यादा पर उठे सवाल
जिला जांजगीर-चांपा।
शिक्षा विभाग की गरिमा को धूमिल करने वाला सनसनीखेज मामला सामने आया है। शिक्षा एवं प्रशिक्षण संस्थान जांजगीर में पदस्थ व्याख्याता सुरेश प्रसाद साहू ने लगातार तीन वर्षों से हो रहे मानसिक और आर्थिक शोषण से त्रस्त होकर महामहिम राष्ट्रपति महोदया को इच्छा मृत्यु की अनुमति के लिए आवेदन दिया है। इस प्रकरण ने पूरे जिले में शिक्षा विभाग की कार्यशैली और जिम्मेदार अधिकारियों की भूमिका पर गंभीर प्रश्नचिह्न खड़ा कर दिया है।
तीन साल से लगातार प्रताड़ना
व्याख्याता सुरेश प्रसाद साहू का आरोप है कि संस्थान के प्रभारी प्राचार्य बी.पी. साहू उन्हें पिछले तीन वर्षों से मानसिक व आर्थिक रूप से प्रताड़ित कर रहे हैं। उच्च अधिकारियों तक कई बार शिकायतें पहुंचाने के बावजूद, प्राचार्य की ऊँची पहुँच और संरक्षण के कारण कोई ठोस कार्रवाई नहीं हो सकी।
महिला व्याख्याता से भी अभद्र व्यवहार
केवल सुरेश प्रसाद साहू ही नहीं, बल्कि एक महिला व्याख्याता ने भी प्राचार्य पर गंभीर आरोप लगाए हैं। महिला व्याख्याता का कहना है कि बी.पी. साहू ने उनके साथ अभद्र व्यवहार किया, जिसके चलते उन्होंने आत्मसम्मान की रक्षा हेतु नींद की गोलियां खाकर जान देने की कोशिश की। पीड़िता ने जिला प्रशासन और पुलिस अधीक्षक तक बार-बार गुहार लगाई, लेकिन कोई सख्त कार्रवाई न होना प्रशासन की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाता है।
पदोन्नति से वंचित, चरित्रावली में हेरफेर
सुरेश प्रसाद साहू का कहना है कि उन्हें जानबूझकर प्राचार्य पदोन्नति से वंचित किया गया। इतना ही नहीं, उनकी गोपनीय चरित्रावली (ACR) में भी नियमों के विरुद्ध नकारात्मक टिप्पणियाँ दर्ज कर दी गईं, जिससे उनका नाम पदोन्नति सूची से बाहर कर दिया गया।
वेतन में गैरकानूनी कटौती
पीड़ित व्याख्याता का वर्तमान मूल वेतन 59,200 रुपए होना चाहिए, लेकिन बीते दो महीनों से इसे घटाकर 47,742 रुपए कर दिया गया है। यह राशि 2018 के वेतनमान से भी कम है। इस कटौती के कारण वे अपने बैंक लोन और एलआईसी प्रीमियम तक जमा नहीं कर पा रहे हैं।
पक्षपातपूर्ण रवैया और वित्तीय अनियमितता
इसके विपरीत, प्राचार्य बी.पी. साहू अपने नज़दीकी कर्मचारियों को पूरे सप्ताह में केवल एक दिन बुलाकर उनके हस्ताक्षर करवा लेते हैं और उन्हें पूरा वेतन दे दिया जाता है। यह न केवल भ्रष्टाचार है, बल्कि वित्तीय अनियमितता की पराकाष्ठा है।
प्रशासनिक जांच की माँग
यह मामला केवल एक शिक्षक की व्यक्तिगत पीड़ा नहीं, बल्कि शिक्षा विभाग में गहराई तक फैले भ्रष्टाचार और भाई-भतीजावाद का जीता-जागता उदाहरण है। यदि इस पर तुरंत और कठोर कार्रवाई नहीं हुई तो शिक्षा संस्थानों की छवि धूमिल होगी और कर्मचारियों का मनोबल टूटेगा।
जनता और प्रशासन से अपील
अब सबसे बड़ा सवाल यह है कि जब एक शिक्षक ही न्याय के लिए विवश होकर इच्छा मृत्यु की गुहार लगा रहा है, तो आम कर्मचारी किस पर भरोसा करें?
जिला प्रशासन, पुलिस विभाग और शिक्षा विभाग को तत्काल संज्ञान लेकर प्रभारी प्राचार्य बी.पी. साहू के विरुद्ध निष्पक्ष जांच कर कठोर कार्रवाई करनी चाहिए। साथ ही पीड़ित व्याख्याता सुरेश प्रसाद साहू को न्याय और सम्मान दिलाना शासन-प्रशासन की प्राथमिक जिम्मेदारी होनी चाहिए।

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