बस्तर संवाददाता – अर्जुन झा
लक्ष्य की तुलना में इस साल कम मिली 1800 टन यूरिया खाद
जगदलपुर। बस्तर जिले की सहकारी समितियों के दर्जनों लेम्पस गोदामों में 700 टन से अधिक यूरिया डम्प कर रखा गया है। वहीं किसान यूरिया के लिए जिले के निजी संस्थानों के लायसेंस धारकों की दुकानों के चक्कर लगाते फिर रहे हैं। वहीं कुछ लेम्पसों में यूरिया पिछले दरवाजे से महंगे दामों पर बिक्री किए जाने की चर्चा है और कृषि विभाग के अधिकारी अनजान बने हुए हैं। उन सहकारी लैंपस की पॉस मशीन एवं स्टॉक पंजी का मिलान किया जाए तो काफी अंतर पाया जा सकता है लेकिन करे कौन? ये कर्ताधर्ता भी चढ़ावा पाकर खामोश बैठ गए हैं। निजी संस्थानों पर नकेल कस अफसरों के सामने कार्रवाई की संख्या गिनाई जाती है।
लक्ष्य की तुलना में 1800 टन यूरिया कम मिलने से किसान हलाकान परेशान हैं और यूरिया के बदले अमोनियम सल्फेट का उपयोग करना किसानों की मजबूरी बन गई है। ज्ञातव्य हो कि धान के समर्थन मूल्य में बढ़ोत्तरी के बाद से किसान धान उत्पादन करने में ज्यादा रूचि दिखा रहे हैं जिसका यह परिणाम है कि जिले में यूरिया की उपयोगिता बढ़ी है। वहीं प्रशासन पूर्व के अनुपात में किसानों को पर्याप्त यूरिया उपलब्ध नहीं करा रहा है। विभागीय कार्यालय से मिली जानकारी के अनुसार खरीफ सीजन के लिए यूरिया बस्तर जिले के लिए 20450 मेट्रिक टन लक्ष्य निर्धारित किया गया था जिसके एवज में अगस्त माह तक 18630 मेट्रिक टन यूरिया प्राप्त हो सका है। जिसमें सहकारी संस्थानों के लिए 11950 मेट्रिक टन का लक्ष्य था जिसके एवज में लेम्पस को 9133 टन यूरिया उपलब्ध कराया जा चुका है। निजी संस्थानों के लिए 8500 टन लक्ष्य के एवज में 9497 उपलब्ध कराया गया है। सरकारी एवं निजी संस्थानों के लक्ष्य के अनुरूप 1800 मेट्रिक टन यूरिया कम प्राप्त हुआ है।
700 टन यूरिया डंप
कृषि विभाग एवं जिला विपणन अधिकारी से मिली जानकारी के अनुसार लेम्पस में 700 टन यूरिया डंप कर रखा गया है। वहीं विपणन के गोदामों में भी 200 टन यूरिया डंप है। विपणन अधिकारी ने बताया कि समितियों की उदासीनता के कारण 200 टन यूरिया गोदाम में डंप है। लेम्पस से मांग आने पर उपलब्ध कराने की बात कही जा रही है।
यूरिया शॉर्टेज की असल वजह
विभाग के अधिकारियों का मानना है कि बस्तर जिले में हजारों एकड़ वन भूमि पर
किसान मक्का उत्पादन कर रहे हैं, जिसमें यूरिया का बहुत ज्यादा उपयोग हो रहा है और उक्त रकबा शासकीय रिकाडों में दर्ज होने के कारण विभाग यूरिया की सही उपयोगिता का आंकलन करने में फेल हो रहे हैं। जिसके कारण यूरिया की कमी से किसान परेशान हैं। कुछ किसानों ने बताया कि अधिकांश किसान उत्पादन बढ़ाकर अधिक मुनाफा कमाने के उद्देश्य से हाईब्रिड धान बीज लगा रहे हैं जिसमें यूरिया का उपयोग भी अधिक किया जा रहा है। किसानों एवं कृषि अधिकारी की मानें तो प्रति एकड़ मक्का में 5 से 6 बोरी एवं धान में प्रति एकड़ 2 से 3 बोरा यूरिया की खपत होती है। इस कारण यूरिया की शॉर्टेज की समस्या जिले में बढ़ी है। इन बारीकियों का सही आंकलन नहीं किए जाने के कारण मांग कम होने से यूरिया की समस्या बनी है जिसकी खामियाजा किसानों को भुगतना पड़ रहा है जिसका सीधा असर फसल उत्पादन पर पड़ने की चिंता किसानों को सत्ता नहीं है।
किसानों को नहीं मिलती नकद खाद
लेम्पस में उन किसानों को ही खाद बीज दिया जाता है जो कर्ज लिया करते हैं। कर्ज नहीं नहीं लेने वाले किसानों को खाद नहीं दी जाती है। यानि नकद बिक्री नहीं की जाती। जिन किसानों का कर्ज के माध्यम से खाद ली है उन्हें अतिरिक्त खाद लेम्पस से नहीं दी जाती है। जबकि कई सहकारी संस्थानों के गोदामों में खाद डंप पड़ी है और किसान खाद किल्लत की मार झेल रहे हैं। खाद की शॉर्टेज होने का यह भी एक कारण है कि किसानों को सहकारी संस्थानों से नगद बिक्री न किया जाना।
समितियों में नहीं है डिमांड
जिला विपणन अधिकारी राजेंद्र ध्रुव ने बताया कि हमारे गोदाम में 200 टन से अधिक यूरिया उपलब्ध है। समितियों द्वारा मांग की जाने पर उलपब्ध खाद कराए जाने की बात कही। उन्होंने कहा कि समितियों द्वारा यूरिया की डिमांड नहीं आई है।
यूरिया की कमी नहीं
उप संचालक कृषि विभाग राजीव श्रीवास्तव ने बताया कि जिले में यूरिया की कोई कमी नहीं है लेम्पस के माध्यम से किसानों को यूरिया खाद उपलब्ध कराई जा रही है।
कथनी और करनी में अंतर: लखेश्वर बघेल
बस्तर क्षेत्र से कांग्रेस विधायक लखेश्वर बघेल ने कहा कि सरकार की कथनी और करनी में अंतर है विधानसभा सत्र के दौरान सरकार ने भरोसा दिलाया था कि यूरिया की कमी होने पर अतिरिक्त मांग कर प्रत्येक जिले में उपलब्ध कराई जाएगी। लेकिन बस्तर जिले में यूरिया की किल्लत होने के कारण महंगे दामों पर खरीदने को मजबूर थे अब यूरिया मिलने से कोई फायदा नहीं।









