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पितृ पक्ष में जानिए – पितरों के श्राद्ध से जुड़े गीता के सातवें अध्याय की महिमा

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रतनपुर संवादाता – रवि परिहार

गीता के सातवें अध्याय में पितरों के मोक्ष और मुक्ति से जुड़े सवालों के साथ-साथ श्राद्ध और तर्पण इत्यादि से भी जुड़ी कई महत्वपूर्ण बातें बताई गयी हैं। गीता के इस सातवें अध्याय की महिमा क्या है और इसका पाठ पितृ पक्ष के दौरान क्यों करना चाहिए, चलिए इसे समझते हैं इस कथा के जरिये…

पाटलिपुत्र में शंकुकर्ण नामक ब्राह्मण ने धन कमाया लेकिन पितरों का तर्पण और देवताओं का पूजन नहीं किया।
शंकुकर्ण की मृत्यु के बाद वह प्रेत बना और फिर सर्प योनि में जन्म लिया, जहाँ वह धन की वासना में बँधा रहा।
सर्प योनि में जन्म लेने के बाद, शंकुकर्ण ने अपने पुत्रों को स्वप्न में आकर अपनी मुक्ति का उपाय बताया।
पुत्रों ने गीता के सातवें अध्याय का पाठ करवाया, जिससे शंकुकर्ण ने सर्प शरीर को त्यागकर मोक्ष प्राप्त किया।
मान्यता है कि गीता के सातवें अध्याय का पाठ करने से पितृ दोष से मुक्ति मिल सकती है।

पितरों के श्राद्ध से जुड़े गीता के सातवें अध्याय की महिमा क्या है, इस कथा से समझिये

कथा के अनुसार, पाटलिपुत्र में शंकुकर्ण नामक एक ब्राह्मण रहता था, जिसने बहुत धन कमाया लेकिन वह न तो कभी पितरों का तर्पण करता था और न ही देवताओं का पूजन करता था। एक बार वो ब्राह्मण अपने पुत्रों के साथ यात्रा कर रहा था। मार्ग में आधी रात के समय जब वह सो रहा था, तो एक सर्प ने कहीं से आकर उसकी बाँह में काट लिया। ब्राह्मण को बचाने के कई प्रयास किये गए लेकिन उसके शरीर की रक्षा न हो सकी और कुछ ही क्षणों में उसके प्राण पखेरु उड़ गये। मृत्यु के बाद वह प्रेत बना और फिर बहुत समय के बाद उसका जन्म प्रेत सर्प योनि में हुआ। मरने के बाद और सर्प योनि में जन्म लेने के बाद भी उसका मन धन की वासना में ही बँधा हुआ था। इसलिए, अपने पिछले जन्म में जो धन उसने सुरक्षा हेतु गाड़ रखा था और जिसके बारे में उसने अपने पुत्रों को भी नहीं बताया था, उसकी रक्षा करने वो सर्प के रूप में पहुँच गया।

लेकिन कुछ समय बाद ही वो सांप की योनि से पीड़ित हो गया और साँप की योनि से पीड़ित होकर एक उसने स्वप्न में अपने पुत्रों के समक्ष आकर अपना मनोभाव बताया। सवेरे उठकर उसके सभी पुत्रों ने बड़े ही आश्चर्य के साथ एक-दूसरे से स्वप्न की बातें बताई। उनमें से मंझला पुत्र कुदाल हाथ में लिए घर से निकला और जहाँ उसके पिता सर्प योनि धारण करके रहते थे, उस स्थान पर गया। हालांकि, उसे धन के स्थान का ठीक-ठीक पता नहीं था, फिर भी लोभ बुद्धि से उसने वहाँ पहुँचकर कुछ जगहों पर खोदना शुरू कर दिया। इस दौरान उसने वो बिल भी खोद दिया, जिसमें उसके पिता सर्प रूप में रहते थे। जब वो खोद ही रहा था कि तभी एक बड़ा भयानक साँप प्रकट हुआ और बोला, ‘अरे मूर्ख! यह बिल क्यों खोद रहा है?’

इसपर उसके पुत्र ने कहा कि मुझे रात्रि में देखे हुए स्वप्न से पता चला है कि यहाँ धन गड़ा है। मैं उसे ही यहाँ लेने आया हूँ। इसपर उसके सर्प रूपी पिता बोले – “मैं तेरा पिता हूँ और मैं ही तेरे सपने में आया था। यदि तू मेरा पुत्र है, तो मुझे शीघ्र ही इस बन्धन से मुक्त कर। मैं अपने पूर्व-जन्म के गाड़े हुए धन के लालच के कारण ही सर्प-योनि में उत्पन्न हुआ हूँ।”

इसपर उसके पुत्र ने पूछा की उनकी मुक्ति कैसे होगी। इसपर उसके पिता ने कहा कि ‘मेरे जैसे कर्म हैं, मुझे मुक्त करने में तीर्थ, दान, तप और यज्ञ भी समर्थ नहीं हैं। केवल गीता का सातवाँ अध्याय ही प्राणियों के मृत्यु आदि दुःखों को दूर करने वाला है। इसलिये, मेरे श्राद्ध के दिन गीता के सप्तम अध्याय का पाठ करने वाले ब्राह्मण को श्रद्धा पूर्वक भोजन कराओ, इससे जरूर मुझे मुक्ति मिल जायेगी।

सर्प योनि में जन्मे अपने पिता के ये वचन सुनकर उसके सभी पुत्रों ने उसकी आज्ञानुसार गीता के सातवें अध्याय का पाठ करवाया। तब शंकुकर्ण ने अपने सर्प शरीर को त्यागकर दिव्य देह धारण किया और सारा धन पुत्रों के अधीन कर मोक्ष को प्राप्त किया। मान्यता है कि गीता के सातवें अध्याय को सुनने मात्र से ही मानव सभी पापों से मुक्त हो जाता है और मोक्ष को प्राप्त होता है। ज्योतिष के अनुसार पितृ पक्ष में गीता के सातवें अध्याय का पाठ करने से पितृ दोष से मुक्ति मिल सकती है।

दैवज्ञ पण्डित रमेश शर्मा श्री मंगलागौरी मन्दिर धाम शंकराचार्य आश्रम पोड़ी रतनपुर

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