जांजगीर-चांपा- संवाददाता – राजेन्द्र जयसवाल
लेखिका : गौरी भूमें, व्याख्याता, शासकीय उच्चतर माध्यमिक विद्यालय बरपाली, चांपा, जिला जांजगीर-चांपा (छ.ग.)
जिला जांजगीर-चांपा । महिला प्राचीन काल से ही शक्ति, सहनशीलता और त्याग की प्रतीक रही है। हमारे धर्मग्रंथों में भी नारी को देवी का स्थान प्रदान किया गया है। “यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवताः”—जहां नारी का सम्मान होता है, वहीं देवताओं का वास माना गया है। लेकिन आज यह प्रश्न चिंतन का विषय है कि क्या आधुनिक समाज में महिलाओं को वह उच्च स्थान वास्तव में प्राप्त है?
एक ओर महिला को सम्मान और शक्ति का स्वरूप बताया जाता है, तो दूसरी ओर उसे हीन भावना से देखा जाता है। इस दोहरे दृष्टिकोण में परिवर्तन लाने का सबसे प्रभावी माध्यम है—शिक्षा।
शिक्षा : उत्थान का शस्त्र
महिला के लिए शिक्षा केवल ज्ञान प्राप्त करने का साधन नहीं, बल्कि आत्मसम्मान और अधिकारों की रक्षा का हथियार भी है। शिक्षा से महिला में आत्मविश्वास, जागरूकता और स्वतंत्र सोच का विकास होता है।
अशिक्षा ही महिला की दुर्दशा का मूल कारण है।
दहेज-प्रथा, भ्रूण हत्या, घरेलू हिंसा, सामाजिक असमानता जैसी बुराइयाँ शिक्षा के अभाव में और भी गहरी हो जाती हैं।
पढ़ी-लिखी महिला ही अपने हक और सम्मान के लिए आवाज उठा सकती है।
कहा भी गया है कि “एक शिक्षित महिला, कई पीढ़ियों को शिक्षित करती है।”
समाज और महिला
समाज में महिलाओं की भूमिका हमेशा दूसरों के अनुसार जीने तक सीमित कर दी गई है—
पहले पिता की इच्छा के अनुसार,
फिर पति की आज्ञा के अनुसार,
और बाद में पुत्र की अपेक्षाओं के अनुसार।
स्वयं के अनुसार जीने का अवसर उन्हें प्रायः नहीं मिलता। जो महिलाएं अपनी इच्छा के अनुसार जीवन जीना चाहती हैं, समाज उन्हें चरित्रहीन कहकर तिरस्कृत करता है। यही दोहरा मापदंड महिलाओं के आत्मविश्वास को कमजोर करता है।
महिला शक्ति की पहचान
महिला के त्याग और सहनशीलता को अक्सर उसकी कमजोरी समझ लिया जाता है। परंतु जब यही महिला अन्याय और शोषण के विरुद्ध खड़ी होती है, तो उसका स्वरूप माँ काली की तरह प्रचंड हो जाता है। इतिहास गवाह है कि—
किरण बेदी पुलिस सेवा में शीर्ष पद तक पहुँचीं,
सानिया मिर्जा ने खेल जगत में भारत का नाम रोशन किया,
महिलाएं राष्ट्रपति बनीं, ओलंपिक में स्वर्ण पदक तक हासिल किया।
ऐसे अनगिनत उदाहरण हैं, जो यह सिद्ध करते हैं कि महिला किसी भी क्षेत्र में पीछे नहीं है।
विवेकानंद का आह्वान
स्वामी विवेकानंद जी का संदेश— “उठो, जागो और तब तक मत रुको जब तक लक्ष्य प्राप्त न हो जाए।”—महिला उत्थान के लिए सबसे उपयुक्त मार्गदर्शन है। महिलाओं को चाहिए कि वे शिक्षा को हथियार बनाकर आत्मनिर्भर बनें और समाज में सम्मान के साथ जीवन जिएं।
समाज में व्याप्त असमानता, शोषण और अत्याचार को समाप्त करने का एकमात्र उपाय है
समाज में व्याप्त असमानता, शोषण और अत्याचार को समाप्त करने का एकमात्र उपाय है—महिला शिक्षा। यदि महिला शिक्षित है तो वह अपने अधिकारों के लिए आवाज उठा सकती है, परिवार और समाज को सही दिशा दे सकती है। महिलाओं को अब यह समझना होगा कि वे किसी से कम नहीं हैं। शिक्षा से सशक्त होकर ही वे अपने जीवन का निर्णय स्वयं ले सकती हैं और एक न्यायपूर्ण, समान और प्रगतिशील समाज का निर्माण कर सकती हैं।









