Home चर्चा में बकावंड क्षेत्र में बेखौफ दौड़ रहे हैं “यमदूत”; रोकने वाला कोई नहीं

बकावंड क्षेत्र में बेखौफ दौड़ रहे हैं “यमदूत”; रोकने वाला कोई नहीं

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बस्तर संवाददाता – अर्जुन झा

छोटे पिकअप वाहनों से ठूंस ठूंस कर ढोए जा रहे हैं मजदूर 
अक्सर होते रहते हैं हादसे, ओड़िशा से लाते हैं मजदूर
फार्म हाउस मालिक कर रहे मजदूरों का शोषण भी 

बकावंड। विकासखंड बकावंड में फार्म हाउस संचालक मजदूरों की जान से सरेआम खिलवाड़ कर रहे हैं। उनका आर्थिक, शारीरिक और मानसिक शोषण भी यहां किया जा रहा है। ओड़िशा से छोटे पिकअप वाहन में ठूंस ठूंसकर मजदूरों को फार्म हाउसों में काम कराने लाया जाता है। कई बार मजदूरों से भरे पिकअप वाहन पलट चुके हैं और जान माल की हानि भी हो चुकी है।
गरीब ग्रामीण मजदूरों का किस कदर आर्थिक, मानसिक और शारीरिक शोषण किया जाता है, इसका बड़ा उदाहरण बकावंड विकासखंड में संचालित एक फार्म हाउस में देखने को मिल रहा है। यहां रोज पड़ोसी राज्य ओड़िशा से मजदूर लाए जाते हैं। महज डेढ़ सौ रुपए की मजदूरी देकर इन मजदूरों से 12 घंटे हाड़तोड़ काम कराया जाता है और ओड़िशा से लाने ले जाने के दौरान उनकी जान से खिलवाड़ भी खुलकर किया जाता है। 9 नवंबर 2024 को शाम 7बजे हादसे में तीन मजदूरों की मौत हो जाने के बाद भी फार्म हाउस मालिक बाज नहीं आ रहे हैं। उल्लेखनीय है कि नौ माह पहले एक पिकअप वाहन में भरकर ओड़िशा के मजदूरों को उनके गांव पहुंचाया जा रहा था। इसी दौरान एक ट्रक ने पिकअप को जबरदस्त टक्कर मार दी थी। इस हादसे में तीन महिला मजदूरों की मौत हो गई थी और तेरह मजदूर घायल हो गए थे।

बकावंड बना फार्मिंग हब
बकावंड अंचल के कृषि फार्म हाउसों में सीमावर्ती प्रांत ओड़िशा से मजदूरों को लाकर उनसे काम कराया जाता है। बस्तर जिले का बकावंड ब्लॉक कृषि फार्म हाउसों का हब बन चुका है। यहां लोकल समेत अंतर राष्ट्रीय स्तर की बीज निर्माण कंपनियां फार्म हाउस संचालित कर रही हैं। इसका कारण यह है कि यहां की जमीन बेहद उपजाऊ है, यहां प्राकृतिक गोबर खाद की प्रचुरता है और ओड़िशा की सीमा से लगे होने के कारण बहुत ही कम मेहनताना पर ओड़िशा से पर्याप्त मजदूर मिल जाते हैं।

महज 150 रू. की मजदूरी
ओड़िशा के सीमावर्ती गांवों से महिला कृषि मजदूरों को महज 150 रुपए रोजी पर लाकर फार्म हाउसों में काम कराया जाता है। ये महिला मजदूर रोजाना सुबह 4.30 बजे उठकर कर अपने और अपने परिवार के लिए भोजन तैयार करती हैं और अपने लिए टिफिन लेकर सुबह 7 बजे घर से निकल पड़ती हैं। दर्जनों मजदूरों को छोटे से पिकअप वाहन में ठूंस ठूंसकर भरा जाता है और स्थानीय कृषि फार्म में सुबह 8 बजे लाया जाता है। कृषि फार्म पर उनकी उपस्थिति सुबह 8 बजे अनिवार्य होती है। दोपहर 1 बजे 1 घंटे के लिए भोजन अवकाश दिया जाता है और शाम 5 बजे छुट्टी दी जाती है। यदि मजदूर आधा घंटे देरी से पहुंचते हैं तो उनकी छुट्टी भी आधा घंटा विलंब से होती है। छोटे छोटे बच्चों से भी यहां काम कराया जाता है।

कृषि भूमि हो रही है बंजर
यहां कृषि भूमि महज 15 हजार रुपए से लेकर 20 हजार रुपए तक की वार्षिक लीज पर मिल जाती है। बीज उत्पादन करने वाली कंपनियों ने भारी मुनाफा होने सपना दिखाकर यहां के आदिवासियों कृषि भूमि पर टमाटर, हरी मिर्च सहित उद्याानिकी फसलों के बीज का उत्पादन करना प्रारंभ कर दिया है। हालांकि बीज निर्माण की ग्रेडिंग प्रकिया व क्रांफ्टेड बैगन, टमाटर, शिमला मिर्च की फसल में किसान ऐसे उलझ गए हैं कि उससे उबर नहीं पा रहे हैं। अब यह कंपनियां अपने उत्पादन के लिए रासायनिक खादों और कीटनाशकों का बेतहाशा इस्तेमाल कर रही हैं। इसकी वजह से लीज पर ली गई आदिवासी किसानों की जमीन तेजी से बंजर होती जा रही है। उस जमीन की उर्वरता वापस लाने का एकमात्र उपाय है कि उस जमीन को डेढ़ फीट तक खोदना पड़ता है दूसरे खेत की मिट्टी लाकर पाटना पड़ता है। कृषि मजदूरों को लाने ले जाने वाले वाहन चालक को कृषि कृषि फार्म हाउस द्वारा महज 30 रुपए प्रति मजदूर की दर से भुगतान किया जाता है और वाहन में 800 रुपए का डीजल डलवाया जाता है। एक्सीडेंट के बाद ओड़िशा के मालवाहक वाहनों से कृषि मजदूरों ढोना लगभग बंद रहा, फिर से मजदूरों को वैसे ही पिकअप वाहन से लाना ले जाना शुरु हो गया है

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