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पुलिस हिरासत में मौत– मानवता पर गहरा कलंक, भाजपा सरकार और पुलिस की जवाबदेही तय हो : विधायक ओंकार साहू

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रिपोर्ट- खिलेश साहू

धमतरी जिले के अर्जुनी थाने में पुलिस हिरासत में हुई दुर्गेंद्र कठोलिया की मौत ने पूरे प्रदेश को झकझोर दिया है। इस दर्दनाक घटना पर छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट की निर्णय ने यह स्पष्ट कर दिया है कि यह केवल एक व्यक्ति की मौत नहीं, बल्कि मानवाधिकार और संवैधानिक मूल्यों पर गहरी चोट है।

विधानसभा क्षेत्र धमतरी के विधायक ओंकार साहू ने कहा—

“हाईकोर्ट का निर्णय अपने आप में एक कठोर सच्चाई उजागर करता है कि यह मौत पुलिस की बर्बरता और प्रशासन की असंवेदनशीलता का नतीजा है। संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत हर नागरिक को जीवन और गरिमा का अधिकार प्राप्त है, लेकिन जब यह अधिकार खुद राज्य की हिरासत में छीना जाता है, तो यह शासन के चरित्र और जवाबदेही पर गंभीर प्रश्नचिह्न है।”

विधायक साहू ने कहा कि धमतरी की यह घटना राज्य की कानून व्यवस्था और मानवाधिकार सुरक्षा तंत्र की विफलता का प्रतीक है। जब किसी व्यक्ति की गिरफ्तारी के कुछ ही घंटों में मौत हो जाती है, और शरीर पर 24 चोटों के निशान मिलते हैं, तो यह किसी भी सभ्य समाज के लिए अस्वीकार्य है।

“इस घटना को सिर्फ मुआवजे की रकम से समाप्त नहीं किया जा सकता। सरकार को यह साबित करना होगा कि वह नागरिकों के जीवन और अधिकारों की रक्षा करने में सक्षम है। दोषी पुलिस अधिकारियों पर त्वरित और कठोर कार्रवाई हो, ताकि ऐसी घटनाएं दोबारा न हों।”

ओंकार साहू ने आगे कहा कि यह मामला सिर्फ एक व्यक्ति की यातना नहीं, बल्कि पूरे राज्य के न्याय तंत्र और मानवीय संवेदनाओं की परीक्षा है। उन्होंने कहा कि जब जनता को न्याय की उम्मीद पुलिस हिरासत में भी नहीं रहती, तो लोकतंत्र अपनी आत्मा खो देता है।

“धमतरी की यह घटना मानवता पर एक स्थायी धब्बा है। यह हमें याद दिलाती है कि शक्ति का दुरुपयोग जब कानून की आड़ में होता है, तो वह अत्याचार से भी अधिक खतरनाक हो जाता है। मैं मृतक परिवार के साथ पूर्ण एकजुटता में खड़ा हूं और विधानसभा में इस मुद्दे को दृढ़ता से उठाऊंगा। यह न्याय और मानव अधिकारों की रक्षा की लड़ाई है — जिसे किसी भी कीमत पर रुकने नहीं दिया जाएगा।”

विधायक साहू ने अंत में कहा कि सरकार को चाहिए कि वह डी.के. बसु दिशा-निर्देशों के पालन को सख्ती से लागू करे, सभी थानों में मानवाधिकार प्रशिक्षण अनिवार्य करे, और कस्टोडियल हिंसा के मामलों में स्वतंत्र न्यायिक जांच आयोग की स्थापना करे।

“राज्य तभी संवेदनशील कहलाएगा, जब उसके नागरिक उसकी हिरासत में सुरक्षित महसूस करेंगे।”

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