बस्तर संवाददाता – अर्जुन झा
= राशन पाना गरीबों का मौलिक अधिकार: पूरन =
= खेती योग्य नहीं है बस्तर की अधिकांश जमीन =
जगदलपुर। छत्तीसगढ़ में सरकार द्वारा ढाई एकड़ से अधिक जमीन रखने वाले परिवारों को राशन योजना से बाहर करने की तैयारी ने बड़ा विवाद खड़ा कर दिया है। बस्तर, दंतेवाड़ा, कांकेर जैसे आदिवासी इलाकों में इस फैसले को लेकर भारी नाराजगी देखी जा रही है। ग्राम पंचायत बड़े चकवा के उप सरपंच पूरन सिंह कश्यप ने इस निर्णय को गरीबों के साथ खुला धोखा और अन्याय बताया है।
उप सरपंच पूरन सिंह कश्यप ने कहा है कि यह नीति सरकार के उस सुशासन योजना के वादे को झुठलाती है, जो गरीबों और किसानों के अधिकारों की रक्षा के नाम पर बनाई गई है। पूरन सिंह कश्यप का कहना है कि बस्तर के अधिकांश आदिवासी किसानों के पास ढाई एकड़ से अधिक जमीन भले ही कागजों में दर्ज हो, लेकिन वास्तविकता में वह जमीन खेती योग्य नहीं है। पहाड़ी, पथरीली और बंजर जमीन से किसी भी परिवार का पालन-पोषण मुश्किल है। फिर भी सरकार केवल जमीन के माप के आधार पर यह तय कर रही है कि कौन गरीब है और कौन नहीं? यह नीति न केवल गलत है, बल्कि आदिवासी समाज के जीवन यथार्थ की अनदेखी भी है। राज्य सरकार के इस कदम से हजारों परिवारों के सामने रोज़ी-रोटी का संकट खड़ा हो जाएगा। श्री कश्यप ने कहा- राशन कार्ड निरस्त होने से गरीब परिवारों की रसोई में अनाज का अभाव हो जाएगा। ऐसे में सरकार के गरीबी उन्मूलन के दावे खोखले साबित हो रहे हैं। पूरन सिंह कश्यप ने कहा कि यह निर्णय पूरी तरह से केंद्र के मापदंडों पर आधारित है, जबकि राज्य सरकार को अपने स्थानीय हालात के अनुसार मानदंड तय करना चाहिए। उन्होंने चेतावनी दी कि यदि यह निर्णय वापस नहीं लिया गया, तो बस्तर के किसान, मजदूर और आदिवासी समुदाय लोकतांत्रिक तरीके से आंदोलन करेंगे। पूरन सिंह कश्यप ने इस मुद्दे को पुरजोर ढंग से उठाने की तैयारी शुरू कर दी है। अब यह मामला राज्य सरकार के लिए राजनीतिक संकट का रूप ले सकता है, क्योंकि आदिवासी और किसान वर्ग ही छत्तीसगढ़ की राजनीति की रीढ़ हैं। श्री कश्यप ने कहा कि यह सरकार सुशासन नहीं, गरीबों का हक छीनने वाली सरकार बन गई है।राशन गरीबों का अधिकार है, कोई अहसान नहीं।









