सुकमा संवाददाता – दीपक पोड़ियामी
छत्तीसगढ़ में वर्षों से जारी माओवादी हिंसा के अंत की दिशा में एक बड़ा परिवर्तन सामने आया है। माओवादी संगठन के पोलित ब्यूरो सदस्य समेत 61 सदस्यों ने 15 अक्टूबर को सशस्त्र संघर्ष विराम की घोषणा की थी। अब आज कमरेड आशन्न के नेतृत्व में लगभग 140 सदस्य — जिनमें राज्य, डिवीजन और एरिया कमेटी के सदस्य शामिल हैं — मुख्यमंत्री की मौजूदगी में इस निर्णय को औपचारिक रूप से लागू करने जा रहे हैं।
राज्य सरकार के अथक प्रयासों और सुरक्षा बलों के दबाव के चलते यह निर्णय नक्सलवाद के खिलाफ लोकतंत्र की एक बड़ी जीत माना जा रहा है।
कामरेड आशन्न ने कहा कि यह आत्मसमर्पण नहीं, बल्कि जनता की मुख्यधारा से जुड़ने और वैधानिक राजनीतिक प्रक्रिया में भागीदारी का निर्णय है।
उपमुख्यमंत्री विजय शर्मा के समक्ष रखी गईं तीन प्रमुख मांगें:
1. “मूलवासी बचाव मंच” पर से प्रतिबंध हटाया जाए।
2. संघर्ष विराम के बाद लौटे सदस्यों को सशस्त्र बलों में शामिल न किया जाए।
3. जेलों में बंद माओवादी सदस्यों पर दर्ज पुराने मामलों को रद्द कर उन्हें रिहा किया जाए।
सूत्रों के अनुसार, राज्य सरकार ने इन मांगों पर सहानुभूतिपूर्वक विचार करने का आश्वासन दिया है, ताकि जो लोग हिंसा छोड़कर लोकतंत्र की राह पर लौटना चाहते हैं, उन्हें अवसर मिल सके।
सरकार और सुरक्षा बलों का दृष्टिकोण:
राज्य सरकार ने स्पष्ट किया है कि यह आत्मसमर्पण नहीं बल्कि शांति और विकास की दिशा में स्वागत योग्य पहल है। सुरक्षा एजेंसियों का मानना है कि इस पहल से जंगलों में हिंसा का दायरा घटेगा और आदिवासी इलाकों में विकास की गति तेज होगी।
यह कदम न केवल छत्तीसगढ़ बल्कि पूरे देश के लिए राहत की खबर है। वर्षों तक निर्दोष ग्रामीणों, सुरक्षा बलों और सरकारी ढांचों पर हमले करने वाले माओवादी अब लोकतंत्र में विश्वास जताते हुए मुख्यधारा में लौट रहे हैं।
यह साबित करता है कि हिंसा का अंत केवल संवाद, विश्वास और विकास से संभव है — न कि बंदूक की नली से।









