दीपावली से एक दिन पहले मनाई जाने वाली काली चौदस, जिसे नरक चतुर्दशी या रूप चौदस भी कहा जाता है, हिंदू पंचांग के अनुसार कार्तिक कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी को आती है। यह दिन देवी काली और भगवान श्री कृष्ण के नरकासुर वध से जुड़ा हुआ माना जाता है।
पौराणिक महत्व:
कथा के अनुसार, इस दिन भगवान श्रीकृष्ण ने नरकासुर नामक राक्षस का संहार किया था, जिससे धरती पर धर्म की पुनर्स्थापना हुई। इसलिए इसे नरक चतुर्दशी कहा जाता है — यानी वह दिन जब अधर्म और अंधकार का अंत हुआ।
देवी काली की पूजा:
कई स्थानों पर इस दिन मां काली की पूजा होती है। भक्त रात्रि में दीप जलाकर मां से नकारात्मक ऊर्जाओं, भय और बुराइयों को दूर करने की प्रार्थना करते हैं। यह दिन आत्मिक शुद्धि और आत्मबल को बढ़ाने का प्रतीक है।
रूप चौदस का सौंदर्य भाव:
काली चौदस को कई जगह “रूप चौदस” के रूप में भी मनाया जाता है। इस दिन स्नान, तैलाभ्यंग और स्वच्छता के विशेष नियम माने जाते हैं ताकि शरीर और मन दोनों से नकारात्मकता दूर हो।
लोक परंपरा:
लोग इस दिन तिल या सरसों के तेल से दीपक जलाते हैं, घर के हर कोने में रोशनी करते हैं और मान्यता है कि इससे नकारात्मक शक्तियाँ दूर रहती हैं। कई घरों में रात को चारों दिशाओं में दीप रखकर “यमदीपदान” किया जाता है, जो अकाल मृत्यु से रक्षा का प्रतीक है।
काली चौदस केवल एक धार्मिक पर्व नहीं, बल्कि यह हमें यह सिखाती है कि जब भीतर का प्रकाश जागता है, तो जीवन के हर अंधकार का अंत स्वयं हो जाता है।









