उत्तराखंड के वैज्ञानिकों ने खगोलशास्त्र के क्षेत्र में एक ऐतिहासिक उपलब्धि हासिल की है। उन्होंने करीब 45 साल पुरानी 1980 की ब्लैक होल थ्योरी को प्रमाणित कर दिखाया है। वैज्ञानिकों की टीम ने रूसी सैटेलाइट की मदद से अंतरिक्ष में दो विशाल ब्लैक होल्स की ऐसी दुर्लभ तस्वीरें ली हैं, जिसमें दोनों एक ही फ्रेम में नजर आ रहे हैं।
इस खोज को वैज्ञानिक समुदाय में एक बड़ा ब्रेकथ्रू माना जा रहा है, क्योंकि अब तक ब्लैक होल्स को एक साथ देख पाना असंभव माना जाता था। शोधकर्ताओं का कहना है कि यह अध्ययन ब्रह्मांड की उत्पत्ति और उसकी संरचना को समझने में अहम भूमिका निभाएगा।
अन्तर्राष्ट्रीय खगोलभौतिकी शोध में प्रथम बार ऐसी स्पष्ट छवि सामने आई है जिसमें दो ब्लैक होल्स एक दूजे के चारों ओर परिक्रमा कर रहे हैं। इस खोज ने 1980 के दशक में प्रस्तुत एक लंबित सिद्धांत को वैज्ञानिक आधार प्रदान किया है।
शोध में पाया गया कि ये दोनों विशालकाय ब्लैक होल्स लगभग ५ अरब प्रकाशवर्ष दूर स्थित क्वेज़र OJ287 प्रणाली में हैं। एक ब्लैक होल का द्रव्यमान लगभग १५० मिलियन सूर्यद्रव्यमान है, जबकि दूसरा लगभग १८ बिलियन सूर्यद्रव्यमान का अनुमानित है।
इस प्रकार की तसवीर बनाने में रेडियो‐दूरबीनों के नेटवर्क और अन्तरिक्ष में स्थित सैटेलाइट प्रणालियों का उपयोग हुआ है। शोधकर्ताओं का कहना है कि यह खोज ब्लैक होल्स के बनने-विकास, परिक्रिया गति और गुरुत्वाकर्षण तरंगों के अध्यन में नए आयाम खोलेगी।
वैज्ञानिक विश्लेषण बताते हैं कि भविष्य में ब्लैक होल्स-मर्जर्स व गुरुत्वाकर्षण तरंगों के अध्ययन से हमारे ब्रह्मांड की शुरुआत, समय-स्थान (space-time) की संरचना तथा ब्रह्मांडीय विकास की गुत्थियाँ और बेहतर समझ में आएँगी।
इस खोज से यह भी संकेत मिलता है कि जिस तरह से ब्लैक होल्स परिक्रमा करते, एकदूसरे से मिलते व अन्ततः मर्ज होते हैं, वह 1980 में प्रस्तावित कुछ सिद्धांतों को अब प्रमाण-सक्षम बना रहा है।
टीम ने बताया कि सैटेलाइट से प्राप्त आंकड़ों का विस्तृत विश्लेषण किया जा रहा है और आने वाले समय में इसके और भी महत्वपूर्ण खुलासे सामने आ सकते हैं।









