= अनुभवी संविदा शिक्षकों और कर्मियों की वेदना को महसूस करने की जरूरत =
= उम्मीदों पर पानी फेर दिया है शासन के फैसले ने =
-अर्जुन झा–
जगदलपुर। इन आंखों से झरते आंसू, सालों के अनुभवी, लेकिन अब बुझे हुए ये चेहरे सरकार के लिए कहीं अभिशाप न बन जाएं। ये वही चेहरे हैं, वही थरथराते होंठ हैं, जिन्होंने अनगिनत बच्चों के मन और आंखों में सुनहरे भविष्य की उम्मीदें जगाई हैं, मगर अब वही अनुभवी चेहरे नाउम्मीदी के कोहरे से ढंक गए हैं। नौकरी छूट जाने के गम से कहीं ज्यादा गम इस बात का है कि सरकार ने उनके सालों के अनुभव को दरकिनार कर दिया है। उनकी उम्मीदों पर फिलहाल पानी जरूर फिर गया है, मगर उनके हौसले अभी टूटे नहीं हैं, वे अपने हक के लिए संघर्ष जारी रखने के मजबूत इरादे से भरे हुए हैं अभी भी।
मानवीय संवेदना को झकझोर देने वाली यह दास्तां है स्वामी आत्मानंद विद्यालयों में सालों से सेवाएं देते आए संविदा शिक्षकों और अन्य कर्मचारियों की। एक ओर छत्तीसगढ़ सरकार ने 5000 नई शिक्षक भर्ती की मंजूरी दे दी है, वहीं दूसरी ओर आत्मानंद शिक्षकों की सेवा समाप्ति का निर्णय ले लिया गया है। सरकार के इस फैसले से संविदा शिक्षक शिक्षिकाओं और कर्मचारियों पर पहाड़ टूट पड़ा है। सालों साल अथक परिश्रम कर शिक्षा की अलख जगाते आए इन संविदा कर्मियों को एक झटके में नौकरी से हटाना कतई न्याय संगत नहीं है। उनकी आंखों से दिन रात आंसू झर रहे हैं, उनके चेहरे बुझ से गए हैं। उनकी पीड़ा देख लगता है कि आगे चलकर सरकार का यह फैसला कहीं सरकार के लिए ही अभिशाप और मुसीबत न बन जाए।

छत्तीसगढ़ स्वामी आत्मानंद संविदा शिक्षक एवं कर्मचारी संघ का कहना है कि यह शिक्षा नहीं, संवेदना की परीक्षा की घड़ी है। छत्तीसगढ़ स्वामी आत्मानंद संविदा शिक्षक एवं कर्मचारी संघ ने बेमेतरा जिले से जारी उस आदेश पर गहरा आक्रोश व्यक्त किया है, जिसके तहत शासन ने फंड की कमी का हवाला देते हुए 11 संविदा शिक्षकों और कर्मचारियों की सेवाएं समाप्त कर दी हैं। संघ ने इसे शिक्षा के मंदिर से संवेदना का निर्वासन बताया है और कहा है कि यह निर्णय केवल प्रशासनिक नहीं, बल्कि मानवीय संवेदनहीनता का प्रतीक है। संघ के प्रदेश अध्यक्ष दुर्योधन यादव ने कहा कि एक ओर शासन 5000 नए शिक्षकों की भर्ती की घोषणा कर रहा है, वहीं दूसरी ओर उन्हीं विद्यालयों के प्रशिक्षित और अनुभवी संविदा शिक्षकों को फंड की कमी बताकर बाहर किया जा रहा है। यह निर्णय न केवल विरोधाभासी है, बल्कि उन शिक्षकों के आत्मसम्मान पर चोट है जिन्होंने आत्मानंद विद्यालयों की पहचान अपने श्रम और समर्पण से बनाई है। उन्होंने आगे कहा कि फंड की कमी नहीं, संवेदना की कमी है और अब शिक्षक समाज चुप नहीं रहेगा।
होगा प्रदेश भर में आंदोलन
संघ ने स्पष्ट किया है कि यदि शासन ने तत्काल इन शिक्षकों की सेवाएं बहाल नहीं कीं, तो प्रदेशव्यापी आंदोलन प्रारंभ किया जाएगा। संघ की प्रदेश उपाध्यक्ष हेमांगिनी पांडेय ने कहा कि जब सरकार के पास 5000 नए शिक्षकों के लिए फंड है, तो उन्हीं विद्यालयों में वर्षों से सेवा दे रहे शिक्षकों के लिए फंड क्यों नहीं? यह केवल शिक्षकों की जीविका का प्रश्न नहीं, बल्कि शासन की नीतिगत संवेदना की परीक्षा है। श्रीमती पांडे ने कहा कि शिक्षक वह दीपक है जो स्वयं जलकर समाज को रौशन करता है और आज शासन ने उन्हीं दीपकों को बुझाने का कार्य किया है। संघ ने कहा है कि ये वही शिक्षक हैं जिन्होंने वेतन न मिलने पर भी विद्यालयों का संचालन निर्बाध रखा, छात्रों के बीच आशा की लौ जलाए रखी। सात महीने तक बिना वेतन के भी उन्होंने बच्चों को पढ़ाना नहीं छोड़ा, क्योंकि उनके लिए शिक्षा नौकरी नहीं, एक साधना थी।
और आज जब वही शिक्षक अपनी आजीविका से वंचित किए जा रहे हैं, यह न केवल अन्याय है, बल्कि शिक्षण के पवित्र धर्म का अपमान भी है। संघ ने घोषणा की है कि पहले चरण में जिला स्तर पर न्याय संकल्प सभा आयोजित की जाएगी और दूसरे चरण में राजधानी रायपुर में शिक्षक सत्याग्रह रैली के माध्यम से पूरे प्रदेश में यह आवाज़ बुलंद की जाएगी। जरूरत पड़ने पर यह मामला राज्यपाल, मुख्यमंत्री और राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग तक भी पहुंचाया जाएगा। संघ के वरिष्ठ पदाधिकारियों ने कहा कि यह संघर्ष केवल 11 शिक्षकों की बहाली का नहीं, बल्कि पूरे शिक्षक समाज की प्रतिष्ठा का प्रश्न भी है। हम न्याय चाहते हैं, संवेदना की पुनर्स्थापना चाहते हैं। आज शिक्षक समाज की आंखों में आंसू जरूर हैं, परंतु उन आंसुओं के पीछे अडिग संकल्प भी है। क्योंकि शिक्षा हमारा कर्म है, और न्याय हमारा धर्म।









