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सुशासन में सनातन का शोर चहुंओर

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बस्तर संवाददाता – अर्जुन झा

आदिवासियों को हिंदू धर्म के खिलाफ भड़काने की साजिश हो गई नाकाम 
 एकादशी पर गन्ना और पूजन सामग्री की जमकर की गई खरीदारी 

बकावंड। एक वह भी दिन था, जब बस्तर जिले में हिंदू पर्व-त्यौहार मनाने की खिलाफत की जाती थी, गणेश प्रतिमाएं स्थापित करने से मना किया जाता था, आदिवासी समुदाय को हिंदुओं से अलग बताया जाता था। इसे लेकर लाउड स्पीकर से अनाउंसमेंट किया जाता था। आज हालात बदल गए हैं, सुशासन में सनातन के जलवे बिखर रहे हैं। बकावंड ब्लॉक ही नहीं बल्कि पूरे बस्तर में आदिवासी समाज और दूसरी जातियों के लोग अपनी परंपरा के अनुसार हिंदू त्यौहार पहले की तरह ही धूमधाम से मनाने लगे हैं। आज देव उठी एकादशी पर्व पर इसका बड़ा उदाहरण देखने को मिला। शनिवार की सुबह से ही बकावंड मुख्यालय का बाजार श्रद्धालुओं से गुलजार रहा। धार्मिक आस्था और उत्साह के बीच लोग बड़ी संख्या में गन्ना, फूल, माटी कांदा और पूजन सामग्री की खरीदारी करते नजर आए।
जानकारी के अनुसार, एक गन्ना 20 रुपए से लेकर 50 रुपए तक के दामों पर बेचा गया। गन्ने की बढ़ती मांग को देखते हुए व्यापारी सुबह से ही दुकानें सजा कर बैठ गए थे। ग्रामीण इलाकों से भी बड़ी संख्या में श्रद्धालु बाजार पहुंचे और पूजा-पाठ की तैयारियों में जुट गए।एकादशी के अवसर पर भक्तजन भगवान विष्णु की पूजा-अर्चना कर उपवास रखते हैं। इस अवसर पर बकावंड समेत आसपास के ग्रामीण बाजारों में धार्मिक रौनक देखने को मिल रही है। फूल, माटीकांदा और अन्य पूजन सामग्री की बिक्री में भी जबरदस्त बढ़ोतरी दर्ज की गई है। स्थानीय दुकानदारों के अनुसार हर साल एकादशी पर गन्ना और फूल की मांग कई गुना बढ़ जाती है। इस बार भी लोगों में खासा उत्साह देखने को मिल रहा है।

भोलेनाथ के उपासक हैं आदिवासी
हम आपको बता दें कि कुछ विभाजनकारी और विघ्नसंतोषी तत्व आदिवासियों को बरगलाते आए हैं कि वे हिंदू नहीं हैं, उनका धर्म अलग है, तीज त्यौहार और परंपराएं अलग हैं। आदिवासी समुदायों में भी दो फाड़ करने की भी कोशिशें की गईं। जबकि आदिवासी मूलतः इस धरती के प्रथम हिंदू हैं। वे भोलेनाथ शंकर जी को बड़ा देव या बूढ़ा देव के रूप में और माता पार्वती को अपना इष्ट देव मानते हैं उनका पूजन करते हैं। ऐसे में भला भोलेनाथ और माता पार्वती के पुत्र से आदिवासियों का नाता कैसे तोड़ा जा सकता है? प्रभु श्रीराम को जूठे बेर खिलाने वाली माता शबरी भी आदिवासी ही थी। अपने वनवास काल का लंबा समय भगवान राम ने बस्तर के आदिवासियों के साथ ही गुजारा था। दरअसल बाहर से आए एक धर्म विशेष के कुछ लोग तथा कुछ विभाजनकारी तत्व नहीं चाहते कि हिंदू एक रहें। इसलिए वे आएदिन प्रोपगंडा फैलाते रहे हैं, मगर इसे बस्तर के आदिवासियों ने करारा जवाब दे दिया है। यहां सनातन का डंका बज रहा है।

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