जिला रिपोर्टर राजेन्द्र प्रसाद जायसवाल।
सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्ट के आदेशों की खुलेआम हो रही अवहेलना, प्रशासन बना मौन दर्शक
जिला जांजगीर चांपा चांपा नगर की पहचान और 150 वर्ष पुरानी ऐतिहासिक धरोहर लच्छीबंध तालाब आज अपने अस्तित्व की अंतिम लड़ाई लड़ रही है। नगर के मुख्य मार्ग से सटा, थाना के समीप स्थित लगभग 5 एकड़ क्षेत्र में फैला यह जननिस्तारी तालाब अब अवैध कब्जों और व्यावसायिक लालच का शिकार बन चुका है। शासन और प्रशासन की आंखों के सामने तालाब का स्वरूप बदलकर सड़क किनारे दुकानों की लाइन खड़ी कर दी गई है, किंतु कोई कार्रवाई नहीं हो रही है।
जनहित में खुदवाया गया था तालाब, अब बन रही हैं दुकानें
जानकारी के अनुसार, यह तालाब करीब 150 वर्ष पूर्व चांपा के जमींदार परिवार द्वारा जनहित में खुदवाया गया था। राजस्व अभिलेखों में यह आज भी जननिस्तारी तालाब के रूप में दर्ज है। किंतु निजी स्वामित्व का नाम तालाब से जुड़े रहने के कारण, अब कुछ प्रभावशाली लोगों द्वारा इसे पाटकर व्यावसायिक उपयोग हेतु अवैध रूप से दुकानें बनाई जा रही हैं।
सड़क किनारे दुकानों की कतार देखकर ऐसा प्रतीत होता है मानो प्रशासन ने गलत कार्य करने वालों को खुली छूट दे दी हो।
15 वर्ष पूर्व हुआ था जनआंदोलन, अब फिर तालाब पर संकट
बताया जाता है कि करीब 15 से 20 वर्ष पूर्व चांपा के समाजसेवी गिरधारी यादव ने तालाब को बचाने के लिए जनहस्ताक्षर अभियान चलाया था। उस समय तत्कालीन कलेक्टर बी.एल. तिवारी ने तालाब पाटने पर रोक लगाने का आदेश दिया था। किंतु समय बीतने के साथ तालाब के चारों ओर फिर से मिट्टी डाली जाने लगी और धीरे-धीरे उसका स्वरूप बदल गया। अब उसी स्थान पर अवैध रूप से दुकानें बनाकर बेची जा रही हैं।
प्रशासन की दोहरी नीति पर उठ रहे सवाल
आश्चर्य की बात यह है कि कुछ दिन पूर्व बैरियर चौक क्षेत्र में एक छोटे से कब्जे पर तहसीलदार दलबल सहित जेसीबी लेकर पहुंचे और तत्काल कार्रवाई की गई। वहीं लच्छीबंध तालाब, जो सार्वजनिक संपत्ति है, उस पर हो रहे अवैध निर्माण को लेकर प्रशासन मौन है।
नगरवासियों का सवाल है — क्या कानून सबके लिए समान नहीं है?
राजस्व विभाग का यह दायित्व बनता है कि सुप्रीम कोर्ट के आदेशों के अनुसार किसी भी जल स्रोत का स्वरूप न बदले, लेकिन इस मामले में विभाग की चुप्पी गंभीर है।
समाजसेवी गिरधारी यादव ने उठाई आवाज
छत्तीसगढ़ प्रदेश कांग्रेस कमेटी के सचिव एवं समाजसेवी गिरधारी यादव ने बताया कि –
“लच्छीबंध तालाब चांपा की पहचान है। इसे खत्म करना न केवल अवैध है बल्कि जनविरोधी भी है। तालाब में नालियों का गंदा पानी डाला जा रहा है, पचरी और दीवारें तोड़ दी गई हैं। यह सब योजनाबद्ध तरीके से किया जा रहा है ताकि तालाब को पूरी तरह खत्म किया जा सके और उस पर व्यावसायिक लाभ उठाया जा सके। सुप्रीम कोर्ट और एनजीटी के आदेशों की खुली अवहेलना हो रही है।”
उन्होंने आगे कहा कि शासन को चाहिए कि इस तालाब को शासन के अधीन लेकर संरक्षित सार्वजनिक संपत्ति घोषित करे ताकि इसकी ऐतिहासिक पहचान बनी रहे।
सुप्रीम कोर्ट का आदेश — जल स्रोतों का स्वरूप नहीं बदला जा सकता
सर्वोच्च न्यायालय और एनजीटी के आदेश स्पष्ट हैं कि किसी भी तालाब, नदी या कुएं को पाटा नहीं जा सकता। बावजूद इसके चांपा नगर में इस आदेश की धज्जियां उड़ाई जा रही हैं।
नगरवासी मांग कर रहे हैं कि लच्छीबंध तालाब को तत्काल संरक्षित घोषित किया जाए, अवैध दुकानों को हटाया जाए और तालाब का पुनर्जीवन कार्य शुरू किया जाए।
जनता की उम्मीद — प्रशासन कब जागेगा?
लच्छीबंध तालाब न केवल जल स्रोत है, बल्कि चांपा की ऐतिहासिक और सांस्कृतिक धरोहर है। नगरवासियों का कहना है कि यदि अब भी प्रशासन नहीं जागा तो आने वाली पीढ़ियाँ केवल तस्वीरों और कहानियों में इस तालाब का नाम सुनेंगी।
जनहित में सवाल — क्या चांपा की इस धरोहर को बचाया जा सकेगा, या विकास के नाम पर इतिहास मिटा दिया जाएगा?









