बस्तर संवाददाता – अर्जुन झा
बालक छात्रावास में बड़ी लापरवाही, खौलते तेल से बुरी तरह झुलसा छात्र
अधीक्षक और रसोइया थे गायब, भूखे छात्र खुद बना रहे खाना
बकावंड। आदिम जाति विकास विभाग द्वारा संचालित आश्रम छात्रावासों में अधिकारियों की मनमानी, भ्रष्टाचार और लापरवाही छात्रों पर भारी पड़ रही है। छात्रावासी बच्चों की जान खतरे में पड़ गई है। ऐसा ही एक वाकिया विकासखंड की ग्राम पंचायत बारदा स्थित बालक छात्रावास में सामने आया है। इस छात्रावास में एक छात्र खौलते तेल से बुरी तरह झुलस गया है। छात्रावास के अधीक्षक और रसोईया नदारद थे और बच्चे भूख से बेहाल हुए जा रहे थे। ऐसे में बच्चों ने खुद ही भोजन तैयार करना शुरू कर दिया। इसी दौरान यह दर्दनाक हादसा हो गया।
छात्रावास में रहकर अध्ययनरत ग्राम पंचायत किजोली निवासी छात्र टुमन भद्रे रसोइया की अनुपस्थिति और छात्रावास अधीक्षक सोनाधार गोयल के नदारद रहने के कारण खुद ही अपने साथियों के लिए भोजन तैयार कर रहा था। इसी दौरान गरम खौलते तेल की चपेट में आने से उसका चेहरा बुरी तरह झुलस गया।घटना के बाद भी अधीक्षक और संबंधित विभाग के अधिकारी मामले को दबाने की कोशिश करते रहे।ग्रामीणों की सूचना पर घायल छात्र को आनन-फानन में मेडिकल कॉलेज डिमरापाल में भर्ती कराया गया, जहां उसकी हालत गंभीर बताई जा रही है। ग्रामवासियों ने बताया कि अधीक्षक और रसोइया अक्सर छात्रावास से गायब रहकर निजी कार्यों में व्यस्त रहते हैं, जिसके चलते छात्र खुद खाना बनाने को मजबूर हैं। इससे न केवल उनकी सुरक्षा खतरे में है बल्कि पढ़ाई भी बुरी तरह प्रभावित हो रही है। जब इस विषय पर विकासखंड शिक्षा अधिकारी चंद्रशेखर यादव से चर्चा करनी चाही गई तो उन्होंने मामले से पल्ला झाड़ लिया। इसी तरह जनपद अध्यक्ष सोनबारी भद्रे और मंडल संयोजक लीलाधर कश्यप ने भी बयान देने से कतराते हुए खुद को मामले से खुद को अलग बताया। ग्राम पंचायत बारदा की सरपंच तिलोत्तमा मौर्य ने बताया कि घटना की जानकारी मिलते ही उन्होंने मौके पर पहुंचकर निरीक्षण किया और उच्च अधिकारियों को सूचित किया है। वहीं सहायक आयुक्त गणेश सोरी से संपर्क करने का प्रयास किया गया, लेकिन उन्होंने फोन रिसीव नहीं किया।छात्रावास अधीक्षक सोनाधार गोयल से बात करने पर उन्होंने भी इस मामले से बचते हुए गोलमोल बात की।
एसी और संयोजक हैं जिम्मेदार
छात्र के झुलसने के मामले में विभाग के सहायक आयुक्त, मंडल संयोजक और छात्रावास अधीक्षक सीधे तौर पर जिम्मेदार हैं। आदिवासी विकास विभाग में भ्रष्टाचार इस कदर बढ़ गया है कि अधिकारियों को अब बच्चों की जान की परवाह तक नहीं रह गई। अधीक्षकों की पोस्टिंग और उन्हें प्रभार देने के नाम पर खुलकर उगाही की जा रही है। बड़े और कमाऊ छात्रावासों में पोस्टिंग के लिए विभाग में बोली लगती है। जो शिक्षक सबसे ज्यादा रकम देता है, उसे आश्रम, छात्रावासों का अधीक्षक बना दिया जाता है। ऐसे अधीक्षकों की मदद से छात्रावासी बच्चों के हक पर डाका डालकर राशि की बंदरबांट कर ली जाती है।छात्रों को ढंग का भोजन, नाश्ता नहीं दिया जाता, साबुन तेल उपलब्ध नहीं कराए जाते और उन्हें छात्रवृत्ति राशि भी पूरी नहीं दी जाती। आलम यह है कि स्वार्थ के चलते एक शिक्षक को दो दो छात्रावासों का प्रभारी नियुक्त कर दिया जाता है। इस मसले को कई उठाया जा चुका है, मगर सहायक आयुक्त कोई संज्ञान ही नहीं ले रहे हैं। इससे जाहिर होता है कि ऎसी नियुक्तियों में प्रत्यक्ष अप्रत्यक्ष उनकी भी सहमति रहती है। एक अधीक्षक दो दो जगह का प्रभार संभाले हुए हैं। ऐसे में वे दोनों छात्रावासों की व्यवस्था सही ढंग से नहीं सम्हाल रहे हैं। वही आयुक्त और मंडल संयोजक छात्रावासों को दुधारू गाय की तरह कमाई का जरिया बना चुके हैं। विकासखंड के मंडल संयोजक और आयुक्त ने अधीक्षक को खुलकर भ्रष्ट्राचार करने की छूट दे रखी है। अधीक्षकों का कहना है कि उच्च अधिकारी और वर्तमान सरकार के जनप्रतिनिधियों का हमें पूर्ण संरक्षण है। हमारा कोई कुछ नहीं बिगाड़ सकता।









