श्री अटामी ने कहा की जनजाति समाज में मतांतरण एवं अलगाव का भाव उत्पन्न करने के लिए नए- नए आंदोलन खड़े करने का प्रयास हो रहा है ।1994 की सी.वी. सी.आई पुणे की सभा में सचिव प्रतिवेदन में बताया गया कि चर्च दलित मुक्ति आंदोलन, आदिवासी मुक्ति आंदोलन एवं पर्यावरण सुरक्षा जैसे विषयों पर मिशनरी सहयोग कर रहे हैं । भारत में विभेद पैदा करने के लिए यह आंदोलन दलित, आदिवासी,महिला, जल, जंगल, जमीन, जानवर एवं पर्यावरण संरक्षण के नाम पर अलग – अलग समूहों के द्वारा संचालित हो रहे है । हम राम नहीं रावण के वंशज हैं, हमारे देवता महिषासुर है, हमारा धर्म अलग है, यह आंदोलन इसी षड़यंत्र का परिणाम है । परिवर्तन केवल इतना हुआ कि इसमें अर्बन माओवाद एवं ऐसे ही विचारों से पोषित स्वैच्छिक एवं मानवाधिकारवादी जैसे समूह भी इस षड्यंत्र में जुड़ गए है । जो वैश्विक संजाल बनाने में भी सफल हो रहे हैं । शोषण से मुक्ति के नाम पर नक्सलवाद ने भी हजारों युवकों को हिंसा के मार्ग पर धकेल कर आदिवासी समाज का विकास ही अवरुद्ध किया है ।
प्रकृति के प्रति अनन्य श्रद्धा रखने वाला जनजाति समाज विराट सनातन संस्कृति का ही अभिन्न अंग है । प्रकृति एवं अपनी भूमि के प्रति उसमें आगाध श्रद्धा है । सनातन संस्कृति में भी प्रकृति (जल, जंगल, जमीन) को पवित्र माना गया है । समस्त नदियों में माँ गंगा के दर्शन, तुलसी , वट, पीपल आदि की पूजा, शुभ कार्य करते समय भूमि का पूजन सनातन में भी प्रकृति की उपासना ही है । समस्त जानवर, समस्त वर्ण सभी उपास्य है । उदाहरणार्थ – वृक्ष पूजा, शिव की सवारी बैल, बिना नंदी शिव दर्शन नहीं, गणेशजी का मस्तक हाथी, सर्प शिव का हार, राम कृष्ण का वर्ण नील, तिरुपति व्यंकटेश स्वामी कृष्ण वर्ण, माँ काली का रंग काला यह सभी ही सर्व समावेश के लक्षण हैं । सम्पूर्ण देश को जोड़ने वाले भगवान राम का माँ कौशल्या के माध्यम से छत्तीसगढ़ से संबंध, भगवान श्रीकृष्ण की पत्नी रुक्मणी का मणिपुर एवं अरुणाचल से संबंध, द्रौपदी के पाँच पांडव पति से जोड़कर जौनसार जनजाति में प्रचलित बहुपति प्रथा, थारू जनजाति में पूज्य पवित्र हल्दीघाटी मिट्टी एवं धार के महाराजा भोज से बुक्सा जनजाति से संबंध को कैसे विस्मरण कराया जा सकता है । जनजातीय समाज की जिस संस्कृति को जड़ात्मवादी कहा गया, वह जड़ात्मवादी नहीं सभी को एक एवं एक में सबके दर्शन करने वाली है । इसका विकास ऋषि- मुनियों के तप से होने के कारण एवं सभी संतों की तपस्थली जंगल (अरण्य) होने के कारण इसको अरण्य संस्कृति भी कहा गया है । इसी अरण्य संस्कृति को इन्हीं जनजाति समाज ने संरक्षण देने का कार्य किया है ।
जनजाति समाज के उत्थान के लिए प्रतिबद्ध भाजपा सरकार ने स्वतंत्र जनजाति मंत्रालय,जनजाति आयोग का गठन किया । प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी जी ने वनोपज का न्यूनतम समर्थन मूल्य एवं स्टैंडअप इंडिया स्कीम में उद्यमिता विकास के लिए 1 लाख से 10 करोड़ तक की सहायता राशि प्रदान करने की व्यवस्था की है । जनजाति समाज में व्याप्त रोग सिकल सेल के समूल नाश का प्रयास मोदी सरकार राज्य सरकारों के साथ मिलकर कर रही है ।देश की संवैधानिक व्यवस्था में महामहिम राष्ट्रपति श्रीमती द्रौपदी मुर्मू, अनेक राज्यों में महामहिम राज्यपाल एवं अनेक संवैधानिक दायित्व पर जनजाति नेतृत्व स्थापित है ।प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी जी के नेतृत्व एवं गृह मंत्रालय के संकल्प से नक्सलवाद मुक्त भारत बन रहा है । जिसके कारण जनजाति क्षेत्र का विकास भी संभव हो सकेगा ।
श्री अटामी ने कहा की भगवान बिरसा मुंडा के 150 वीं जयंती के अवसर पर जब हम जनजाति गौरव दिवस मनाते हैं इसका अर्थ संपूर्ण जनजाति समाज द्वारा भारत के विकास में योगदान का स्मरण करना हैं।हम जनजातीय समाज को अपना प्रेम देते हुए उनके विकास में अपना योगदान का संकल्प लेना हैं । नक्सल मुक्त भारत के संकल्प के साथ खड़े होना है ।हमारी अपनी एक संस्कृति है हमारे सभी के महापुरुष समान है यह भाव विकसित कर समस्त विघातक षड़यंत्रों से जनजाति समाज को मुक्त करना है, इन संकल्पों से ही जनजाति गौरव दिवस मनाने की पूर्ति होगी एवं भगवान बिरसा मुंडा को हमारी सच्ची श्रद्धांजलि होगी ।इस दौरान जिलाध्यक्ष संतोष गुप्ता,जिला पंचायत अध्यक्ष नंदलाल मुडामि,पिंटू उइके,कमला विनय नाग,नगरपालिका अध्यक्ष पायल गुप्ता,मुकेश शर्मा,सत्यजीत चौहान,सत्यनारायण महापात्र,सुनीता भास्कर,रमेश गावड़े,सोमड़ू कोर्राम समेत अन्य पदाधिकारी उपस्थित हुए |









