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नवीन शासकीय कन्या महाविद्यालय में जनजातीय गौरव दिवस पर गरिमामय व्याख्यान कार्यक्रम संपन्न

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एमसीबी संवाददाता – हनुमान प्रसाद यादव

एमसीबी/ नवीन शासकीय कन्या महाविद्यालय मनेन्द्रगढ़ में जनजातीय गौरव दिवस के अवसर पर एक भव्य एवं सारगर्भित व्याख्यान कार्यक्रम का आयोजन किया गया। कार्यक्रम का मुख्य विषय “जनजातीय समाज का गौरवशाली अतीत: ऐतिहासिक, सामाजिक एवं आध्यात्मिक योगदान” रहा, जिसके माध्यम से जनजातीय समुदाय की आदिम संस्कृति, स्वाभिमान की परंपरा, राष्ट्रनिर्माण में उनकी महत्वपूर्ण भूमिका तथा सामाजिक समरसता पर विस्तृत चर्चा की गई।

मुख्य वक्ता ने जनजातीय समाज की गौरवगाथा रखी
कार्यक्रम के मुख्य वक्ता श्री परमेश्वर सिंह मरकाम, अध्यक्ष—जनजातीय गौरव समाज, ने अपने प्रभावी संबोधन में कहा कि जनजातीय समुदाय का इतिहास भारत की मूल सांस्कृतिक पहचान का आधार है। उन्होंने बताया कि जनजातीय समाज की जीवन पद्धति प्रकृति-पूजन, समानता, सहयोग और सामुदायिक न्याय व्यवस्था पर आधारित रही है, जो आज के आधुनिक समाज के लिए भी प्रेरणास्रोत है। श्री मरकाम ने वीर नारायण सिंह, बिरसा मुंडा, गुंडाधुर ,अहिल्याबाई जैसे जननायकों के संघर्षों को स्मरण करते हुए युवा पीढ़ी को अपने गौरवशाली अतीत से प्रेरणा लेने का आह्वान किया।

मुख्य अतिथि ने छात्राओं के विकास की दिशा में चल रही पहलें बताईं
कार्यक्रम में मुख्य अतिथि श्रीमती नीलू जायसवाल, अध्यक्ष—जनभागीदारी समिति, ने कहा कि महाविद्यालय में जनजातीय छात्राओं को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा, छात्रवृत्ति योजनाएँ, कौशल-विकास गतिविधियाँ तथा सुरक्षा-सुविधाएँ उपलब्ध कराने के लिए निरंतर प्रयास किए जा रहे हैं। उन्होंने जनजातीय छात्राओं से शैक्षणिक अवसरों का अधिकतम लाभ उठाने और समाज में नेतृत्व की भूमिका निभाने की प्रेरणा दी। श्रीमती जायसवाल ने अपने वक्तव्य में कहा कि जनजातीय समाज ने सदैव अपनी परंपराओं और संस्कृति का संरक्षण किया है। जनजातीय समुदाय ने ‘जन-जंगल-जमीन’ को सर्वोपरि माना है। उन्होंने कहा कि भगवान बिरसा मुंडा आधुनिक समाज के लिए प्रेरणा-स्रोत हैं। साथ ही उपस्थित जनों से आह्वान किया कि वे देश की संस्कृति और विरासत को मजबूती से समर्थन दें।

विशिष्ट वक्ता ने जनजातीय वीरता और परंपराओं का स्मरण कराया
विशिष्ट वक्ता श्री हंसराज सिंह, पूर्व अध्यक्ष—जनपद पंचायत मनेन्द्रगढ़, ने कहा कि जनजातीय इतिहास केवल एक परंपरा नहीं, बल्कि साहस, संघर्ष और स्वाभिमान की अद्भुत गाथा है। उन्होंने जंगल आंदोलनों, अंग्रेजी शासन के विरुद्ध विद्रोहों तथा जनजातीय नायकों के असाधारण योगदान का उल्लेख किया। श्री सिंह ने बताया कि जनजातीय समाज हमेशा से पर्यावरण संरक्षण और प्राकृतिक संसाधनों के संतुलित उपयोग का जीवंत उदाहरण रहा है। उन्होंने कहा कि हमारी मातृ शक्ति और पितृ शक्ति, जो समय के साथ कहीं खोती चली गई थीं, आज जनजातीय गौरव दिवस के माध्यम से फिर से सम्मानपूर्वक उजागर हो रही हैं। अपने संबोधन में उन्होंने विशेष रूप से भगवान बिरसा मुंडा का उल्लेख करते हुए कहा कि उनके 150वें जन्मवर्ष को मनाना पूरे जनजातीय समाज के लिए गर्व का विषय है। मात्र 25 वर्ष की अल्पायु में उन्होंने अंग्रेजों के अत्याचारों के विरुद्ध जो संघर्ष किया, वह अद्वितीय है। इसी संघर्ष ने उन्हें “भगवान” का दर्जा दिलाया।

विशिष्ट अतिथि ने सांस्कृतिक समृद्धि को बताया प्रेरणा का स्रोत
इस अवसर पर विशिष्ट अतिथि डॉ. रश्मि सोनकर, सदस्य—जनभागीदारी समिति, ने जनजातीय कला, नृत्य, लोकगीत, चिकित्सा पद्धति और सामुदायिक जीवन की विशिष्टताओं पर प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि जनजातीय संस्कृति में स्त्री की भूमिका अत्यंत सशक्त और सम्मानित रही है, जो आज के समाज के लिए आदर्श है। डॉ. रेशमा सोनकर ने अपने उद्बोधन में कहा कि भगवान बिरसा मुंडा स्वतंत्रता के संग्राम से स्नात थे और उन्होंने जनजातीय समाज को एकजुट किया। उन्होंने बताया कि बिरसा मुंडा के जागरण से प्रभावित होकर जनजातीय समुदाय ने उन्हें भगवान का दर्जा दिया। मात्र 25 वर्ष की आयु में ही वे ‘भगवान बिरसा’ बनकर अमर हो गए।

अध्यक्षीय उद्बोधन में प्राचार्य ने दिया महत्वपूर्ण संदेश
कार्यक्रम की अध्यक्षता डॉ. राम किंकर पाण्डेय, प्राचार्य—नवीन शासकीय कन्या महाविद्यालय मनेन्द्रगढ़, ने की। अपने प्रेरणादायक उद्बोधन में उन्होंने कहा कि जनजातीय समाज का गौरवशाली इतिहास हमें सिखाता है कि सांस्कृतिक विविधता किसी भी राष्ट्र की वास्तविक शक्ति होती है। उन्होंने छात्राओं को जनजातीय समाज की परंपराओं, उनकी जीवन शैली और आध्यात्मिक मूल्यों को शोध और अध्ययन का महत्वपूर्ण विषय बनाने की सलाह…

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