महात्मा ज्योतिबा फुले भारत के उन महान समाज सुधारकों में से एक थे जिन्होंने सदियों से चली आ रही जातिगत और सामाजिक विषमता को चुनौती दी। 28 नवंबर को उनकी पुण्यतिथि के अवसर पर आज पूरा देश उन्हें श्रद्धा और कृतज्ञता के साथ स्मरण करता है।
फुले जी ने शिक्षा को सामाजिक बदलाव का सबसे सशक्त माध्यम माना और इसी सोच के साथ उन्होंने 1848 में अपनी पत्नी सावित्रीबाई फुले के साथ मिलकर देश की पहली कन्या पाठशाला की स्थापना की। उस दौर में जब स्त्रियों और निम्न जातियों के लिए शिक्षा एक सपना थी, फुले दंपत्ति ने समाज की कुरीतियों के खिलाफ निडर होकर काम किया।
महात्मा फुले ने ‘सत्यशोधक समाज’ की स्थापना कर ब्राह्मणवादी वर्चस्व और अंधविश्वासों को चुनौती दी। वे दलित, पिछड़ों और महिलाओं के हक़ की आवाज़ बने। उनके विचार आज भी सामाजिक समरसता, समानता और न्याय की प्रेरणा देते हैं।
इस पुण्यतिथि पर हमें उनके आदर्शों को आत्मसात करने और समाज में व्याप्त किसी भी तरह के भेदभाव के खिलाफ एकजुट होने की आवश्यकता है। महात्मा फुले का जीवन हमें बताता है कि परिवर्तन केवल विचारों से नहीं, बल्कि कर्म और संघर्ष से आता है।









