दुनिया भर में हर एक व्यक्ति के जन्मसिद्ध अधिकारों की अहमियत को उजागर करने के लिए, हर वर्ष १० दिसम्बर को मानवाधिकार दिवस मनाया जाता है। मानवाधिकार सभी के लिए समानता, स्वतंत्रता और गरिमा सुनिश्चित करती है तथा संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकारों की रक्षा करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है, यह बात कहते हुए राष्ट्रीय मानवाधिकार एवं सामाजिक न्याय आयोग (विधि) के प्रदेश अध्यक्ष एवं उच्च न्यायालय अधिवक्ता चितरंजय सिंह ने कहा कि आज सुखद संयोग है कि छत्तीसगढ़ के प्रथम स्वतंत्रता सेनानी शहीद वीर नारायण सिंह की शहादत दिवस है जिन्होंने आजादी के पूर्व ब्रिटिशकाल में भी लोगों के अधिकारों के लिए संघर्ष किया अर्थात शहीद वीर नारायण सिंह आदि मानवाधिकार कार्यकर्ता अर्थात छत्तीसगढ़ के प्रथम मानवाधिकार कार्यकर्ता रहे जो एक तरफ ब्रिटिश सरकार के खिलाफ स्वतंत्रता के लिए संघर्ष किया तो वहीं जल, जंगल और जमीन में मूलनिवासियों के हक की लड़ाई का सूत्रपात किया और और १९५६ में भीषण अकाल के समय लोगों के भूख मिटाने जान जोखिम में डाल कर ब्रिटिश सरकार के खिलाफ जाकर उन्हें अनाज उपलब्ध कराया, फलस्वरूप आज राष्ट्रीय मानवाधिकार दिवस मनाने के साथ ही शहीद वीर नारायण सिंह जी छत्तीसगढ़ के प्रथम मानवाधिकार कार्यकर्ता के रूप में सम्मान का अवसर है तथा हम सभी के साथ ही राज्य सरकार का दायित्व है कि छत्तीसगढ़ गौरव शहीद वीर नारायण सिंह के बलिदान की गाथा हर व्यक्ति तक पहुंचाएं एवं इस हेतुक राज्य सरकार विश्व मानवाधिकार दिवस १० दिसंबर पर शहीद वीर नारायण सिंह के शहादत की याद में छत्तीसगढ़ गौरव दिवस घोषित कर छत्तीसगढ़ के प्रथम मानवाधिकार कार्यकर्ता वीर नारायण सिंह को समुचित सम्मान प्रदान करे ताकि राज्य का हर व्यक्ति उनके योगदान को आत्मसात करे।
शहीद वीर नारायण सिंह के संबध में विदित है कि शहीद वीर नारायण सिंह (१७९५-१८५७) छत्तीसगढ़ के वनांचल सोनाखान के एक जमींदार और स्वतंत्रता सेनानी थे, जिन्हें १९५७ के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम के दौरान अंग्रेजों के खिलाफ लड़ने और गरीबों के लिए अनाज लूटने के आरोप में १० दिसंबर १८५७ को राजधानी रायपुर के जय स्तंभ चौंक में फांसी दी गई थी तथा राज्य के इतिहास में उन्हें छत्तीसगढ़ के प्रथम शहीद और गरीबों का रक्षक माना जाता है, जिन्होंने अपने साहस और बलिदान से मातृभूमि के प्रति आस्था जगाई।
छत्तीसगढ़ के देवरी सोनाखान के गोंड आदिवासी जमींदार उनके पिता राम राय भी अंग्रेजों के खिलाफ विद्रोही थे, जिनके मृत्यु उपरांत ३५ वर्ष की युवावस्था में वीर नारायण सिंह अपने पिता से विरासत में सोनाखान की जमींदारी प्राप्त कर अल्प आयु में ही जमींदार बने।
इस दरमियान १८५६ के भीषण अकाल में उन्होंने अंग्रेजों के खास व्यापारी के अनाज भंडार को लूटकर गरीबों में बांट दिया, जिसके आरोप में उन्हें गिरफ्तार किया गया, पर गुलामी के खिलाफ संघर्ष के जज्बे से लबालब युवा वीर नारायण जेल से भाग निकले और सोनाखान लौटकर ५०० लोगों की सेना बनाई तथा १८५७ के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम में छत्तीसगढ़ के लोगों में देशभक्ति का का अलख जगाया, परन्तु ब्रिटिश सेना का डटकर मुकाबला करते हुए एक बार फिर अंग्रेजों के गिरफ्त में आ गए जहां इस बार ब्रिटिश सरकार ने उन्हें कानून तोड़ने और राजद्रोह के आरोप में दोषी ठहरा कर आज ही के दिन १० दिसंबर, १८५७ को रायपुर के जयस्तंभ चौक पर उन्हें सार्वजनिक रूप से फाँसी दे दी गई और इतिहास में छत्तीसगढ़ से प्रथम स्वतंत्रता संग्राम १८५७ के प्रथम शहीद के रुप में अमर हो गए, जिनके सम्मान में छत्तीसगढ़ सरकार ने राज्य के ‘शहीद वीर नारायण सिंह अंतर्राष्ट्रीय क्रिकेट स्टेडियम’ का नाम रखा है और उन्हें ‘गरीबों और किसानों के रक्षक’ के रूप में स्मरण किया जाता है। निश्चित रूप से शहीद वीर नारायण सिंह अपने साहस, न्यायप्रियता और मातृभूमि के प्रति अटूट समर्पण और संघर्ष के लिए छत्तीसगढ़ के इतिहास में अमर हैं इसलिए राज्य सरकार से आग्रह है कि उनके शहादत दिवस १० दिसंबर राष्ट्रीय मानवाधिकार दिवस के साथ ही छत्तीसगढ़ गौरव दिवस घोषित किया जाए।









