= आदिवासियों ने परंपरा, संस्कृति और पूजा पद्धति की समझी अहमियत =
-अर्जुन झा –
जगदलपुर। बस्तर संभाग के कांकेर जिले के अंतागढ़ ब्लॉक के आमाबेड़ा क्षेत्र में हुई घटना ने आदिवासी समाज में बड़ी हलचल मचा दी है। लगातार हो रहे कन्वर्जन से आदिवासी समुदाय अब अपनी परंपराओं, संस्कृति, प्रकृति पूजन और पूजा पद्धति के संरक्षण को लेकर चिंतित हो उठा है। राह भटक चुके लोग भी अब अपने मूल धर्म के महत्व को समझने लगे हैं और मूल धर्म में वापसी करने लगे हैं।

इसी क्रम में ग्राम चिखली के तीन परिवारों से जुड़े 19 आदिवासी ग्रामीणों ने अपने पथ-पुरखा, देवी-देवताओं और पारंपरिक आदिवासी संस्कृति के प्रति आस्था व्यक्त करते हुए मूल धर्म में विधिवत घर वापसी की है। घर वापसी करने वाले ग्रामीणों ने कहा कि आदिवासी समाज की पहचान उसकी संस्कृति, परंपरा, प्रकृति-पूजा और सामूहिक जीवन मूल्यों में निहित है। पीढ़ियों से चली आ रही रीति-रिवाज, पर्व-त्योहार और प्रकृति के साथ सह अस्तित्व ही आदिवासी समाज की आत्मा है, जिसे संरक्षित करना प्रत्येक आदिवासी का कर्तव्य है। इस अवसर पर सुकलू राम ने भावुक शब्दों में कहा कि व्यक्तिगत समस्याओं के चलते वे कुछ समय के लिए ईसाई धर्म से जुड़े थे, लेकिन आमाबेड़ा की घटना ने उन्हें अपने मूल अस्तित्व और सांस्कृतिक जड़ों की ओर लौटने के लिए प्रेरित किया। उन्होंने स्पष्ट किया कि वे अब सदैव के लिए ईसाई धर्म का त्याग कर अपने परिवार सहित आदिवासी रीति-रिवाजों और परंपराओं के मार्ग पर लौट आए हैं। सुकलू राम ने समाज के अन्य लोगों से भी अपील की कि जो आदिवासी किसी कारणवश अपने मूल धर्म से दूर हो गए हैं, वे अपनी संस्कृति, परंपरा और पहचान को मजबूत करने के लिए पुनः मूल धर्म में लौटें और आने वाली पीढ़ियों को अपनी गौरवशाली विरासत से जोड़ें।यह घर वापसी केवल धर्म परिवर्तन नहीं, बल्कि आदिवासी समाज की आत्मा, अस्मिता और सांस्कृतिक चेतना के पुनर्जागरण का प्रतीक मानी जा रही है। आदिवासी समाज का यह कदम आने वाले समय में अपनी परंपराओं के संरक्षण, सामाजिक एकता और सांस्कृतिक गौरव को और अधिक सुदृढ़ करने की प्रेरणा देगा।









