भारत के सामने इस समय व्यापार को लेकर दो बड़ी परेशानियां हैं. पहली परेशानी अमेरिका से जुड़ी है और दूसरी चीन से. दोनों ही देश भारत के बड़े ट्रेड पार्टनर हैं, लेकिन दोनों के साथ हालात अलग-अलग हैं.
भारत और अमेरिका के बीच ट्रेड डील की बातचीत चल रही है, लेकिन यह साफ नहीं है कि समझौता कब होगा. टैरिफ हटेगा या नहीं, इस पर अभी कोई पक्का जवाब नहीं है. जब तक दोनों देश किसी नतीजे पर नहीं पहुंचते, तब तक भारत को यह दबाव झेलना पड़ेगा. इसका असर शेयर बाजार और विदेशी निवेश पर भी दिख रहा है.
दूसरी समस्या अमेरिका से भी बड़ी मानी जा रही है. यह परेशानी चीन के साथ बढ़ते ट्रेड घाटे की है. भारत और चीन के बीच ट्रेड डेफिसिट अब 100 अरब डॉलर से भी ज्यादा हो चुका है.
भारत चीन से बहुत ज्यादा सामान मंगाता है, लेकिन चीन को उतना सामान नहीं बेच पाता. इसका सीधा नुकसान भारत की कमाई को होता है. सबसे ज्यादा मार देश के छोटे और मझोले उद्योगों यानी MSME सेक्टर पर पड़ रही है. धीरे-धीरे यह ट्रेड घाटा अर्थव्यवस्था को भी कमजोर कर रहा है.
इस समस्या को दूर करने के लिए भारत को किसी दूसरे देश से बातचीत करने की जरूरत नहीं है. इसके लिए सरकार खुद फैसला ले सकती है.
सरकार बजट 2026 में एक बड़ा कदम उठा सकती है. इसका मकसद इंपोर्ट पर निर्भरता कम करना और देश के भीतर मैन्युफैक्चरिंग को बढ़ावा देना होगा. माना जा रहा है कि सरकार उन प्रोडक्ट्स पर ध्यान देगी, जिनका उत्पादन भारत में हो सकता है, लेकिन फिर भी उन्हें बाहर से मंगाया जा रहा है.
सरकार दो तरह के फैसले ले सकती है:
- कुछ प्रोडक्ट्स पर इंपोर्ट ड्यूटी बढ़ाई जा सकती है
- कुछ प्रोडक्ट्स के लोकल मैन्युफैक्चरर्स को आर्थिक मदद दी जा सकती है
इससे उन देशों को नुकसान हो सकता है, जिनके साथ भारत का ट्रेड घाटा बहुत ज्यादा है. खासकर ऐसे देश, जिनसे भारत नॉन-ऑयल प्रोडक्ट्स ज्यादा मंगाता है.






