जांजगीर चांपा संवाददाता – राजेन्द्र जायसवाल
चांपा छत्तीसगढ़ की लोकसंस्कृति में पौष अमावस्या का विशेष महत्व है। इसी पावन तिथि पर मनाया जाने वाला पारंपरिक लोकपर्व छेरछेरा दान–पुण्य, आपसी भाईचारे और सामाजिक समरसता का अनुपम उदाहरण है। यह पर्व विशेष रूप से बच्चों के उत्साह, लोकगीतों और ग्रामीण जीवन की आत्मीयता से जुड़ा हुआ है।
सुबह होते ही चांपा सहित पूरे जिले में बच्चों की टोलियां हाथों में झोला लिए, पूरे उत्साह के साथ सुबह 8 बजे से घर–घर जाकर छेरछेरा मांगती नजर आती हैं। बच्चों के मुख से गूंजते लोकगीत—
“छेरछेरा माई, कोठी के धान ल हेर-हेरा,
अरन-बरन कोदो दरन, जभे देबे तभे टरन…”
— केवल शब्द नहीं, बल्कि सदियों से चली आ रही लोकपरंपरा का जीवंत स्वरूप हैं।
दान–पुण्य और लोकआस्था का पर्व
छेरछेरा को दान का त्यौहार कहा जाता है। इस दिन लोग बच्चों को धान, चावल, गेहूं, कोदो, पैसा या अन्य अन्न दान करते हैं। मान्यता है कि इस दिन दिया गया दान घर में सुख-समृद्धि और अन्नपूर्णता लाता है। यह पर्व यह भी सिखाता है कि समाज में कोई भूखा न रहे और सभी एक-दूसरे के सुख-दुख में सहभागी बनें।
बच्चों का पर्व, संस्कारों की पाठशाला
छेरछेरा बच्चों के लिए केवल उत्सव नहीं, बल्कि संस्कारों का पहला पाठ भी है। इस परंपरा के माध्यम से बच्चों में
सामाजिक मेलजोल
विनम्रता
सामूहिकता
दान का महत्व
जैसे गुण विकसित होते हैं।
गांव–शहर सब जगह एक सा उत्साह
पहले यह पर्व मुख्यतः गांवों तक सीमित था, लेकिन अब चांपा जैसे शहरी क्षेत्रों में भी पूरे हर्षोल्लास के साथ मनाया जाने लगा है। लोग अपने घरों के द्वार खोलकर बच्चों का स्वागत करते हैं और लोकसंस्कृति से जुड़ने पर गर्व महसूस करते हैं।
लोकसंस्कृति की जीवंत पहचान
छेरछेरा केवल एक त्यौहार नहीं, बल्कि छत्तीसगढ़ की आत्मा है। यह पर्व हमें हमारी जड़ों से जोड़ता है और बताता है कि हमारी लोकपरंपराएं आज भी उतनी ही प्रासंगिक और जीवंत हैं।
छेरछेरा तिहार समाज को जोड़ने वाला, मानवता और करुणा का संदेश देने वाला छत्तीसगढ़ का अनमोल लोकपर्व है, जिसे सहेजना और अगली पीढ़ी तक पहुंचाना हम सभी की जिम्मेदार









