रायपुर संवाददाता – रघुराज
रायपुर। रायपुर शहर में प्रशासनिक लापरवाही और मनमानी का सिलसिला थमने का नाम नहीं ले रहा। पश्चिम विधानसभा के गोंदवारा क्षेत्र (जोन क्रमांक 1) में नगर निगम की टीम ने शाम 5 बजे बाद भारी साजो-सामान के साथ धावा बोल दिया। 3 जेसीबी, 2 बड़े ट्रक, 3 टेंपो और 50 से अधिक कर्मियों की फौज घर-घर जाकर नक्शा-डायवर्शन चेक करने लगी। बिना किसी पूर्व नोटिस या लिखित आदेश के यह कार्रवाई हुई, जिससे रहवासियों में दहशत फैल गई। जब सवाल किया गया तो जवाब मिला – “सर्वे करने आए हैं”। सवाल उठता है कि सर्वे के नाम पर जेसीबी क्यों लाई गई? क्या यह तोड़फोड़ की तैयारी थी?
यह मामला केवल एक क्षेत्र तक सीमित नहीं। पूरे रायपुर में कब्जा जमीनों और पाटा भूमि पर अवैध निर्माण का बोलबाला है। व्यापारी और प्रभावशाली लोग बिना टैक्स, बिना लोन के दुकानें-मकान खड़े कर ट्रैफिक जाम पैदा कर रहे हैं। 10-10 बार शिकायत के बावजूद अफसर आंखें बंद किए हुए हैं। लेकिन गोंदवारा जैसे मेहनतकश इलाके में जहां लोग दिनभर मजदूरी कर बैंक से लोन जोड़कर घर बनाते हैं, वहां अचानक शाम को फौज आ धमकती है। एक रहवासी जित विश्वास ने बताया, “3 महीने पहले नक्शा पास का आवेदन दिया, कोई जवाब नहीं। आज काम से लौटते फोन आया – जेसीबी लग गई। जल्दबाजी में एक्सीडेंट हो गया, गाड़ी चली गई। कौन जिम्मेदार?”
अब नया खुलासा हुआ है कि नगर निगम और प्रशासन की टीमें घर-घर जाकर बिना सत्यापन के वोटर लिस्ट में नाम जोड़-काट रही हैं। कब्जा जमीनों पर बसे लोगों के नाम धड़ल्ले से ऐड किए जा रहे, जबकि वैध दस्तावेज वाले लोनधारकों को निशाना बनाया जा रहा। सूत्रों के अनुसार यह सिलसिला चुनावी लाभ के लिए चल रहा है। जहां असली अतिक्रमण हटाने की जरूरत है, वहां नाकामी साफ दिख रही। इसके बजाय बैंक लोन वाले घरों पर जबरन दबाव बनाया जा रहा। बैंक ने अधूरे दस्तावेज पर लोन कैसे दिया? यह बड़ा सवाल है। यदि घर तोड़े भी गए तो भरपाई कौन करेगा – मुआवजा, पुनर्वास या कानूनी सहायता?
स्थानीय रहवासी अजय त्रिपाठी जी ने कहा, “हमने खसरा, B-1, पट्टा सब चेक करवाकर बैंक से लोन लिया। बैंक ने जॉइंट वेरिफिकेशन की। अब नगर निगम कहता है अवैध। कौन सच्चाई बोलेगा?” एक अन्य महिला ने रोते हुए बताया, “बच्चों को स्कूल से लाने का समय था। जेसीबी देखकर डर गए। बुजुर्ग बीमार हैं, उनका क्या?” इस कार्रवाई से मोहल्ले में अफरा-तफरी मच गई। लोग सामान समेटने लगे, महिलाएं-बच्चे सड़क पर। जब अफसरों से आदेश मांगा गया तो मौन। कोई नोटिस नहीं, कोई सूची नहीं।
यह पहली घटना नहीं। हर 4 महीने में यही सिलसिला दोहराया जाता। सूत्र बताते हैं कि यह पैसे वसूलने का धंधा है। जहां बड़े अतिक्रमण हैं – बाजार, शॉपिंग कॉम्प्लेक्स – वहां चुप्पी। लेकिन छोटे लोनधारक परिवार निशाने पर। वोटर लिस्ट में हेरफेर का आरोप भी गंभीर है। बिना आधार कार्ड, वोटर आईडी चेक के नाम काटे-जोड़े जा रहे। कब्जा जमीनों को वैध साबित करने की कोशिश? प्रभावितों ने विधायक राजेश मूणत जी से हस्तक्षेप की गुहार लगाई। तेलुगू वेलफेयर सोसाइटी स्थानीय सेवा संगठन सक्रिय हो गए। TWS अध्यक्ष टी गोपी जी ने बताया कानूनी नजरिए से देखें तो छत्तीसगढ़ भू-अतिक्रमण निवारण अधिनियम और उच्च न्यायालय के दिशानिर्देश स्पष्ट हैं – नोटिस, सुनवाई, पुनर्वास अनिवार्य। बिना इनके कार्रवाई अवैध। बैंक लोन स्वीकृति में राजस्व-निगम प्रमाणपत्र जरूरी होता है। अब उलटबांसियां क्यों? यदि गलती हुई तो जिम्मेदारी कौन लेगा? प्रभावित परिवार पूछ रहे – हमारा घर टूटेगा तो नया घर कौन बनवाएगा? EMI चुकानी पड़ेगी या माफी मिलेगी? पुनर्वास कॉलोनी कब तक?
शहरवासी सवाल उठा रहे कि प्रशासन की प्राथमिकता क्यों उल्टी है? ट्रैफिक ब्लॉक करने वाले अवैध निर्माण सलामत, मेहनतकशों के घर खतरे में। वोटर लिस्ट में हेराफेरी से लोकतंत्र पर सवाल। नगर निगम आयुक्त को स्पष्ट करना होगा – किसके आदेश से ऑफ-टाइम कार्रवाई? नक्शा आवेदनों का स्टेटस क्यों लटका? बैंक-प्रशासन समन्वय क्यों नहीं? यदि सर्वे था तो जेसीबी का औचित्य?
स्थानीय संगठनों ने कलेक्टर और आयुक्त को ज्ञापन देने का ऐलान किया। यदि न्याय न मिला तो धरना-आंदोलन होगा। यह घटना रायपुर प्रशासन की कार्यशैली पर कलंक है। पारदर्शिता, जवाबदेही और मानवीयता की कमी साफ। गरीबों का विश्वास टूट रहा। क्या उच्च स्तरीय जांच होगी? विधायक और सांसद क्यों? रहवासी न्याय मांग रहे – हमारा पसीना बहाकर बनाया घर बचाओ!
रायपुर नगर निगम को तत्काल नोटिस प्रक्रिया, पुनर्वास योजना और वोटर लिस्ट ऑडिट करना चाहिए। बैंक को लोनधारकों को नोटिस जारी कर सहायता देनी होगी। अन्यथा यह मामला हाईकोर्ट तक पहुंचेगा। शहरवासी उम्मीद करते हैं कि न्याय मिले, मनमानी थमे।







