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सौ दिनों के रोज़गार का अधिकार छीना,और 125 दिनों का भ्रम फैला रही बीजेपी सरकार— शैलेष पांडेय

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पेंड्रा संवाददाता दीपक कश्यप
राज्य सरकार के ऊपर पचास हज़ार करोड़ का अधिक भार पड़ेगा- मोहित
मनरेगा बचाओ संग्राम दो माह तक चलेगा- गजमती
मजदूरी चार सौ रुपये करे मोदी सरकार— ध्रुव
पूर्व कांग्रेस विधायक  मोहित 
करकेट्टा शैलेश पांडे अध्यक्ष गजमाती भानु और डॉ के के ध्रुव की संयुक्त प्रेस कॉन्फ्रेंस
पेंड्रा-
 बिलासपुर के पूर्व कांग्रेस विधायक शैलेश पांडे और पाली ताना खार के पूर्व विधायक मोहित केरकेट्टा ने प्रेस कांफ्रेंस आयोजित कर बताया कि मनरेगा के लिए सड़को पर उतरेगी कांग्रेस और वी बी जी राम जी कानून के खिलाफ आंदोलन शुरू करेगी।
कांग्रेस ने मनरेगा के खिलाफ नए वीबी-जी राम-जी एक्ट को लेकर 11 जनवरी से 25 फरवरी तक देशव्यापी ‘मनरेगा बचाओ संग्राम’ चलाने का एलान किया है। 11 जनवरी को महात्मा गांधी की प्रतिमा के समीप एक दिवसीय उपवास कर कांग्रेस इस आंदोलन की शुरुआत करेगी। पार्टी का आरोप है कि नए कानून से रोजगार का अधिकार खत्म होगा और पंचायतों की भूमिका कमजोर पड़ेगी।
कांग्रेस ने घोषणा की है कि वह 11 जनवरी से 25 फरवरी तक देशभर में ‘मनरेगा बचाओ संग्राम’ चलाएगी। पार्टी का कहना है कि नए वीबी-जी राम-जी एक्ट के जरिए ग्रामीण रोजगार की गारंटी खत्म की जा रही है, जिसे किसी भी कीमत पर स्वीकार नहीं किया जाएगा। कांग्रेस ने इस कानून को गरीब और मजदूर विरोधी बताया है।
संयुक्त प्रेस कॉन्फ्रेंस में बिलासपुर के पूर्व कांग्रेस विधायक शैलेश पांडे और पाली ताना खार के पूर्व विधायक मोहित केरकेट्टा ने बताया कि नए कानून से रोजगार अब अधिकार नहीं रहेगा। उन्होंने आरोप लगाया कि केंद्र सरकार मनरेगा को अधिकार आधारित कानून से हटाकर पूरी तरह केंद्रीकृत योजना बनाना चाहती है। पूर्व विधायक शैलेश पांडे,  मोहित केर केट्टा और मरवाही के पूर्व विधायक डॉक्टर के के ध्रुव  सहित कांग्रेस नेताओं का कहना है कि नए एक्ट से पंचायतों की भूमिका कमजोर होगी। मनरेगा के तहत काम, मजदूरी और योजना बनाने का अधिकार गांव स्तर पर था, लेकिन अब इसे केंद्र के नियंत्रण में लाया जा रहा है। पार्टी का दावा है कि इससे ग्रामीण मजदूरों को समय पर काम और भुगतान मिलने में दिक्कतें बढ़ेंगी। कांग्रेस नेताओं ने कहा कि मनरेगा कानून में परिवर्तन मोदी सरकार का श्रमिक विरोधी कदम है। यह महात्मा गांधी के आदर्शों पर कुठाराघात है, मजदूरों के अधिकारों को सीमित करने वाला निर्णय है।
मोदी सरकार ने “सुधार” के नाम पर झांसा देकर लोकसभा में एक और बिल पास करके दुनिया की सबसे बड़ी रोज़गार गारंटी स्कीम मनरेगा को खत्म कर दिया है। यह महात्मा गांधी की सोच को खत्म करने और सबसे गरीब भारतीयों से काम का अधिकार छीनने की जान-बूझकर की गई कोशिश है।
अब तक, मनरेगा संविधान के आर्टिकल 21 से मिलने वाली अधिकारों पर आधारित गारंटी थी। नया फ्रेमवर्क ने इसे एक कंडीशनल, केंद्र द्वारा कंट्रोल की जाने वाली स्कीम में बदल दिया है।
मनरेगा गांधीजी के ग्राम स्वराज, काम की गरिमा और डिसेंट्रलाइज्ड डेवलपमेंट के सपने का जीता-जागता उदाहरण था, लेकिन इस सरकार ने न सिर्फ उनका नाम हटा दिया है, बल्कि 12 करोड़ मनरेगा मज़दूरों के अधिकारों को भी बेरहमी से कुचला है। दो दशकों से, मनरेगा करोड़ों ग्रामीण परिवारों के लिए लाइफलाइन रहा है और कोविड-19 महामारी के दौरान आर्थिक सुरक्षा के तौर पर ज़रूरी साबित हुआ है।
अब तक मनरेगा मजदूरों को काम देने का कानून था, श्रमिक अधिकार पूर्वक मांग करते थे, जिसे योजना में परिवर्तित कर दिया गया, अब इसे चलाना नहीं चलाना सरकार की मर्जी पर निर्भर होगा।
मनरेगा के तहत, सरकारी ऑर्डर से कभी काम नहीं रोका गया। नया सिस्टम हर साल तय टाइम के लिए जबरदस्ती रोज़गार बंद करने की इजाज़त देता है, जिससे राज्य यह तय कर सकता है कि गरीब कब कमा सकते हैं और कब उन्हें भूखा रहना होगा। एक बार फंड खत्म हो जाने पर, या फसल के मौसम में, मज़दूरों को महीनों तक रोज़गार से दूर रखा जा सकता है।
मनरेगा केंद्रीय कानून था, 90 प्रतिशत राशि केंद्र सरकार द्वारा भेजे जाते थे, अब केंद्र और राज्य का हिस्सा 60- 40 का हो जाएगा, पहले मैचिंग ग्रांट 50 प्रतिशत राशि राज्य जमा करेगी तब केंद्र सरकार राशि जारी करेगा, राज्यों की वित्तीय स्थिति सर्वविदित है। इस बिल से आने वाले समय में मनरेगा स्कीम खत्म हो जाएगी। जैसे ही बजट का बोझ राज्य सरकारों पर पड़ेगा, वैसे ही धीरे-धीरे मनरेगा बंद होने लगेगी।
मोदी सरकार अब राज्यों पर “जी राम जी” का लगभग 50,000 करोड…

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