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जल, जंगल और जमीन पर हक के लिए लामबंद हुईं बस्तर की ग्रामसभाएं

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बस्तर संवाददाता – अर्जुन झा

= आवराभाट में महा ग्रामसभा संघ की बैठक =
= वन अधिकार और पेसा कानून को लेकर हुई चर्चा =
जगदलपुर। जल, जंगल और जमीन पर हक के लिए तथा पेसा कानून पर शत प्रतिशत अमल के लिए बस्तर की ग्रामसभाएं लामबंद हो गईं हैं। ग्राम आवराभाट में महा ग्रामसभा संघ की एक महत्वपूर्ण बैठक हुई।
बैठक की अध्यक्षता ईश्वर मौर्य ने की। मंच संचालन बनसिह मौर्य ने किया। बैठक में विभिन्न ग्राम सभाओं से आए प्रतिनिधियों, अध्यक्षों, सचिवों एवं सदस्यों की सक्रिय भागीदारी रही। बैठक का मुख्य उद्देश्य ग्राम सभाओं को सशक्त करना, वन अधिकार मान्यता कानून, पेसा कानून तथा जल-जंगल-जमीन पर सामुदायिक अधिकारों को लेकर साझा समझ और कार्ययोजना तैयार करना था। बैठक को संबोधित करते हुए महा ग्रामसभा संघ के अध्यक्ष लक्ष्मीनाथ कश्यप ने ग्राम सभा की पृष्ठभूमि और उद्देश्य को सामने रखा। उन्होंने कहा कि वन अधिकार मान्यता कानून के अंतर्गत ग्रामसभा को जो अधिकार पत्रक प्राप्त होते हैं, उसके बाद आगे की प्रक्रिया को समझना और लागू करना अत्यंत आवश्यक है। शासन प्रशासन से गांव की समस्याओं के समाधान के लिए महा ग्रामसभा संघ का गठन एक समन्वयक मंच के रूप में किया गया है, ताकि ग्रामसभाओं की आवाज एकजुट होकर मजबूत तरीके से रखी जा सके। उन्होंने यह भी कहा कि जल, जंगल और जमीन पर लोकतांत्रिक व्यवस्था के तहत सामूहिक निर्णय होना चाहिए, जिसमें महिला और पुरुष दोनों की समान भागीदारी सुनिश्चित हो। ग्रामसभा की बैठक नियमित रूप से आयोजित कर ग्रामसभा रजिस्टर एवं उपस्थित पंजी में कार्यवाही दर्ज करना अनिवार्य है, तभी अधिकारों का सही उपयोग संभव होगा। उन्होंने संस्कृति, परंपरागत देवी-देवता स्थलों के संरक्षण, शिक्षा-स्वास्थ्य के अध्ययन, सामाजिक कुरीतियों के उन्मूलन तथा रासायनिक खेती छोड़कर जैविक खेती अपनाने पर जोर दिया। संतू मौर्य ने कहा कि हमें केवल अधिकार पत्रक प्राप्त करने तक सीमित नहीं रहना है, बल्कि अपने गांव के लिए ठोस प्रबंधन कार्ययोजना तैयार करनी होगी। जल, जंगल, जमीन पर वास्तविक मालिकाना हक लेकर ही गांव का सतत विकास संभव है। ग्राम सभा घाटकवाली से आए वन प्रबंधन समिति अध्यक्ष लखेश्वर कश्यप ने अपनी ग्रामसभा के अनुभव साझा किए। उन्होंने बताया कि उनके गांव में लगभग 155 हेक्टेयर भूमि का सामुदायिक वन अधिकार पत्रक प्राप्त हुआ है।सीएफआर क्षेत्र में 5 हेक्टेयर भूमि को अतिक्रमण मुक्त कर 2.5 हेक्टेयर में काजू का पौधारोपण किया गया है। शिक्षा समिति का गठन कर साप्ताहिक बैठक होती है, शिक्षक-विद्यार्थियों की उपस्थिति की निगरानी की जाती है। हाट-बाजार समिति द्वारा प्राप्त राशि ग्रामसभा कोष में जमा की जाती है। कक्षा 5वीं से 12वीं तक अच्छे अंक लाने वाले विद्यार्थियों को ग्रामसभा में बुलाकर सम्मानित किया जाता है। शांति-न्याय समिति में 10 सदस्य, 5 महिलाएं शामिल हैं। यह समिति भूमि विवाद और आपसी विवादों का समाधान करती है। ग्रामसभा की बैठक प्रत्येक माह नियमित रूप से होती है। ग्रामसभा धरमाऊर से शोभा मंडावी ने बताया कि उनके गांव में ग्रामसभा की बैठक नियमित न हो पाना एक बड़ी समस्या है। जागरूकता के अभाव में लोग बैठक में उपस्थित नहीं हो पाते, जबकि जंगल सुरक्षा और खाली जगहों पर पौधारोपण पर गंभीर चर्चा जरूरी है। ग्रामसभा कांदानार से बली बघेल ने कहा कि उनके गांव में चारों ओर घने जंगल हैं और लोग वनोपज, कंद, मूल, फल, हाट-बाजार और आजीविका संसाधनों का उपयोग करते आ रहे हैं। अब प्रबंधन समिति का गठन किया गया है और जंगल सुरक्षा व संसाधनों के सही उपयोग के लिए कार्ययोजना तैयार करना आवश्यक है। कांदानार के सरपंच ने कहा कि गांव किस दिशा में जाएगा, जल, जंगल, जमीन पर अधिकार कैसे लिया जाएगा, यह निर्णय ग्रामसभा ही तय करती है। सुखदेव बघेल ने कहा कि अधिकार पत्रक मिलने के बाद धारा 4(घ) के अंतर्गत जल, जंगल, जमीन पर लोकतांत्रिक व्यवस्था से सामूहिक निर्णय लेकर लिखित कार्ययोजना बनाना हर ग्रामसभा की जिम्मेदारी है। लक्ष्मी मांझी ने कहा कि केवल अधिकार लेकर चुप नहीं बैठना चाहिए। ग्रामसभा में महिला-पुरुष की पूर्ण भागीदारी, महत्वपूर्ण विषयों पर चर्चा और कोरम पूर्ति के साथ ग्रामसभा को मजबूत बनाना जरूरी है। ग्रामसभा आवराभाट में यह निर्णय लिया गया कि महिला ग्रामसभा की बैठक प्रत्येक माह की 15 तारीख और पुरुष ग्रामसभा की बैठक 30 तारीख को नियमित रूप से होगी, जिसमें जंगल सुरक्षा और संसाधनों के संरक्षण पर निर्णय लिए जाएंगे। प्रज्ञा मंडावी ने कहा कि महिला और पुरुष साइकिल के दो पहियों की तरह हैं, दोनों की समान भूमिका से ही ग्राम सभा मजबूत हो सकती है। ग्रामसभा नेतानार से मुन्ना नाग ने बताया कि उनके गांव में बैठक हर माह 15 तारीख को तय है, लेकिन गांव बड़ा होने के कारण 7 पारा में से केवल 3 पारा के लोग ही उपस्थित हो पाते हैं। ग्रामसभा धुडमारास से ईश्वर बघेल ने विस्थापन के मुद्दे पर जोर देते हुए कहा कि आदिवासी-मूलनिवासी क्षेत्रों में जबरन शोषण, माइनिंग या वन्यजीव के नाम पर मुआवजा देकर गांव को बेदखल किया जाता है। इससे बचने के लिए ग्राम सभा का अधिकार पत्रक लेना अत्यंत आवश्यक है। ग्रामसभा कावापाल से महादेव बघेल ने कहा कि रासायनिक खेती से बीमारियां बढ़ रही हैं, इसलिए उनके गांव में गोबर एकत्र कर जैविक खेती को बढ़ावा दिया जा रहा है। लघु वनोपज पर बिचौलियों के नियंत्रण को रोकने और ब्लॉक व जिला स्तर पर संवाद की आवश्यकता पर भी जोर दिया गया। ग्राम टेकामेटा से सुदरु राम बघेल ने जंगल बचाने के लिए चौकीदार के रूप में सेवा देने की बात कही और भूमि खरीद-बिक्री व जंगल कटाई पर रोक लगाने के ग्रामसभा के निर्णय को साझा किया। मोतीराम बघेल ने कहा कि टेकामेटा एशिया का सबसे बड़ा मानव निर्मित ऑक्सीजन जोन है। वन अधिकार पत्रक मिलने के बाद पर्यटन स्थल के रूप में उपयोग का निर्णय लिया गया है। उन्होंने कहा कि ग्रामसभा को हथौड़ा नहीं, चाबी बनना होगा, ताकि लिखित कार्ययोजना के जरिए शासन-प्रशासन से संवाद किया जा सके। महा ग्रामसभा संघ के सचिव मानसिंह बघेल ने बैठक के मुख्य बिंदुओं को संक्षेप में रखते हुए पेसा कानून, वन अधिकार कानून, लघु वनोपज पर मालिकाना हक, विस्थापन और ग्रामसभा के स्वनिर्णय की महत्ता पर प्रकाश डाला। बैठक का समापन ईश्वर मौर्य ने किया। इस अवसर पर 26 ग्रामसभाओं के अध्यक्ष, सचिव एवं सदस्य उपस्थित रहे।

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