संघ, सत्ता और सहमति: दो वर्षों की लंबी मशक्कत
निस्संदेह अनेक विरोधाभासों, विसंगतियों और बाधाओं के बावजूद नरेंद्र मोदी–अमित शाह की सशक्त जोड़ी ने संघ शक्ति से यह सहमति बनवाई कि विद्यार्थी परिषद की पाठशाला से निकला नितिन नवीन संघ के आदर्शों और नीतियों को बचपन से आत्मसात किए हुए हैं।करीब दो वर्षों तक संघ और सत्ता के बीच राष्ट्रीय अध्यक्ष पद को लेकर मंथन चलता रहा। इस बीच निवर्तमान अध्यक्ष द्वारा संघ की भूमिका पर दिए गए बयान संघ को नागवार गुज़रे। परिणामस्वरूप संघ और सत्ता—दोनों ने अपने-अपने नाम सामने रखे, लेकिन सहमति नहीं बन पाई और “अद्भुत संगठन पर्व” टलता रहा।अंततः संघ ने सबसे कम आयु के इस युवा नेतृत्व पर भरोसा जताया और विश्व के सबसे बड़े लोकतंत्र की सबसे बड़ी राजनीतिक पार्टी को नया अध्यक्ष मिला—जिसे भाजपा आज संगठन पर्व के रूप में मना रही है।
अब सवाल छत्तीसगढ़ का: क्या बदलेगी राजनीति की दिशा?
सबसे अहम प्रश्न यही है कि नितिन नवीन की ताजपोशी का छत्तीसगढ़ की राजनीति पर क्या प्रभाव पड़ेगा?
सतही तौर पर कहा जा रहा है कि राज्य में विशेष परिवर्तन नहीं होगा क्योंकि अब तक भी सत्ता और संगठन पर उन्हीं के समर्थकों का प्रभाव रहा है।लेकिन गहराई से देखने पर तस्वीर कुछ और ही संकेत देती है।
पहले नितिन हाईकमान के प्रतिनिधि थे, अब वे स्वयं हाईकमान हैं। ऐसे में वे उन निर्णयों की समीक्षा करने की स्थिति में हैं, जिनमें वे असहमति के बावजूद सहभागी रहे हों।मानवीय स्वभाव भी यही कहता है कि जो फैसले मजबूरी में लिए गए हों, सक्षमता आने पर उन्हें सुधारा जाता है।
कार्यकर्ता बनाम व्यवस्था: असंतोष की चुप्पी
छत्तीसगढ़ में धान खरीदी पर्व हो या अन्य सरकारी आयोजन—भ्रष्टाचार के आरोप लगातार पार्टी कार्यकर्ताओं का मनोबल तोड़ रहे हैं। स्थिति यह है कि कार्यकर्ता किंकर्तव्यविमूढ़ होकर राजनीतिक कोमा में जाने की स्थिति में हैं, जबकि आम जनता तुलना में बार-बार पुराने शासन को याद कर रही है।लोकसभा चुनाव के पूर्व खुली भर्ती के माध्यम से आए लोगों के चलते जनसंघी पृष्ठभूमि के कार्यकर्ताओं में यह भावना गहराई है कि उनके हितों की अनदेखी हो रही है। यही कारण है कि कार्यकर्ता पार्टी के विरुद्ध नहीं जाते, लेकिन चुपचाप घर बैठ जाना उन्हें बेहतर विकल्प लगता है—और इतिहास गवाह है कि जब कार्यकर्ता घर बैठता है, तो सरकार की भी घर वापसी हो जाती है।
नई उम्मीद, नई जिम्मेदारी
नए राष्ट्रीय अध्यक्ष से यही अपेक्षा है कि वे
- संगठन की रीढ़ रहे जनसंघियों के दर्द को समझें
- सत्ता और संगठन के बीच संतुलन स्थापित करें
- और ट्रिपल इंजन की सरकार को ज़मीन से जोड़ने वाले कार्यकर्ताओं को पुनः केंद्र में लाएँ
यदि ऐसा होता है, तो जनसंघ से भारतीय जनता पार्टी तक के सफर में बिना ट्रेन बदले साथ चले कार्यकर्ताओं का भरोसा फिर से मजबूत होगा।









