हारून रशीद| किरंदुल (दंतेवाडा)| 31 जनवरी
किरंदुल और बचेली जैसे औद्योगिक क्षेत्रों में इन दिनों एक गहरी बेचैनी महसूस की जा रही है। यहां के स्थानीय ठेकेदारों और मजदूरों का कहना है कि बाहरी कंपनियों की बढ़ती दखल ने इलाके में रोजगार और आर्थिक संतुलन को झकझोर कर रख दिया है।
स्थानीय लोगों की चिंता केवल काम छिनने तक सीमित नहीं है, बल्कि यह सवाल अब पूरे क्षेत्र की अस्मिता और अधिकारों से जुड़ता जा रहा है—
कि जिस मिट्टी से खनिज निकलता है, क्या उसी मिट्टी के लोगों को सबसे पहले काम नहीं मिलना चाहिए?
स्थानीय ठेकेदारों का आरोप: अवसर सीमित, बेरोजगारी बढ़ी
कुछ महीनों पहले किरंदुल क्षेत्र में काम शुरू करने वाली सामंता कंपनी को एनएमडीसी से बड़े टेंडर मिलने के बाद स्थानीय ठेकेदारों को उम्मीद थी कि उन्हें भी काम में साझेदारी मिलेगी।
लेकिन कई ठेकेदारों का कहना है कि अधिकांश स्थानीय व्यवसायियों को सब-कॉन्ट्रैक्ट नहीं दिए गए। एक ठेकेदार ने नाम न छापने की शर्त पर बताया—
“कुछ गिने-चुने लोगों को छोड़ दें तो बाकी ठेकेदारों के सामने रोज़ी का संकट खड़ा हो गया है। हमारे मजदूर खाली बैठे हैं।”
स्थानीय मजदूरों का भी आरोप है कि कंपनी ने बड़ी संख्या में बाहरी श्रमिकों को काम पर रखा है, जबकि आसपास के गांवों और कस्बों के लोग रोजगार के लिए भटक रहे हैं।
बाहरी मजदूरों की मौजूदगी और स्थानीय पलायन का विरोधाभास
स्थानीय सामाजिक संगठनों के अनुसार क्षेत्र में हजारों बाहरी मजदूर विभिन्न राज्यों से आकर काम कर रहे हैं, जबकि छत्तीसगढ़ के कई स्थानीय श्रमिक रोजगार की तलाश में अन्य राज्यों की ओर पलायन करने को मजबूर हो रहे हैं।
यह स्थिति एक बड़ा विरोधाभास पैदा करती है—
* काम स्थानीय जमीन पर,
* संसाधन स्थानीय क्षेत्र के,
* लेकिन रोजगार बाहरी हाथों में।
स्थानीय लोगों का कहना है कि इससे सामाजिक संतुलन और स्थानीय अर्थव्यवस्था दोनों प्रभावित हो रहे हैं।
स्थानीय सप्लायर भी चिंतित: सामग्री खरीद बाहर से क्यों?
स्थानीय व्यापारियों का यह भी कहना है कि रेत, गिट्टी और अन्य निर्माण सामग्री भी बाहर से मंगाई जा रही है, जबकि किरंदुल-बचेली क्षेत्र में स्थानीय सप्लायर उपलब्ध हैं।
उनका सवाल है—
“जब संसाधन और बाजार यहीं है, तो स्थानीय व्यापार को नजरअंदाज क्यों किया जा रहा है?”
संवैधानिक दृष्टि से भी अहम प्रश्न
विशेषज्ञों का मानना है कि यह विषय केवल आर्थिक नहीं, बल्कि संवैधानिक और सामाजिक न्याय से भी जुड़ा है।
भारत का संविधान समान अवसर, सामाजिक संतुलन और स्थानीय हितों की रक्षा की भावना को मजबूत करता है।
ऐसे में यह सवाल उठता है कि—
* क्या सरकारी उपक्रमों में स्थानीय प्राथमिकता की नीति स्पष्ट होनी चाहिए?
* क्या रोजगार में क्षेत्रीय संतुलन अनिवार्य नहीं है?
प्रशासन और जनप्रतिनिधियों से अपेक्षा
स्थानीय नागरिकों का कहना है कि इस मुद्दे पर प्रशासन और जनप्रतिनिधियों को स्पष्ट भूमिका निभानी चाहिए।
उनकी मांग है कि—
* स्थानीय ठेकेदारों को प्राथमिकता मिले
* रोजगार में स्थानीय युवाओं को अवसर दिया जाए
* निविदा प्रक्रिया में “लोकल प्रेफरेंस क्लॉज” लागू हो
मांग: स्थानीय सहभागिता सुनिश्चित हो
स्थानीय संगठनों ने सुझाव दिया है कि कंपनियों को निर्देशित किया जाए कि—
* कम से कम 70% कार्य स्थानीय ठेकेदारों को दिया जाए
* 80% मजदूर स्थानीय रखे जाएं
ताकि विकास का लाभ उसी समाज तक पहुंचे, जिसके संसाधनों पर यह विकास खड़ा है।
तीसरी आँख का सवाल: विकास किसका?
किरंदुल-बचेली की यह आवाज़ केवल विरोध नहीं है,
यह एक संवेदनशील आग्रह है—
कि विकास की रोशनी अगर स्थानीय घरों तक नहीं पहुंचे,
तो वह विकास नहीं, सिर्फ़ विस्तार बनकर रह जाता है।
अब वक्त है कि नीति, प्रशासन और संस्थाएं यह सुनिश्चित करें कि बस्तर का हक़ सबसे पहले बस्तर के लोगों को मिले।









