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यह खरबपति की चमक-दमक वाली जिंदगी का काला राज़ है… खुदकुशी के पीछे छिपा वो राज जो आपको रोंगटे खड़े कर देगा!

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रायपुर संवाददाता – रघुराज 

कल का बजट हो या वैश्विक सोने का खेल, हर कोई अपनी जेब मजबूत करने के सपने बुन रहा है। लेकिन दार्शनिक अरस्तु की वो बात याद कीजिए – “धन अर्जन का उद्देश्य और सीमा होनी चाहिए, असीम संग्रह जीवन का लक्ष्य नहीं।” आज के दौर में ये कितना प्रासंगिक है? कुछ लोग धन को भगवान बना लेते हैं, और फिर… वो अंत कितना भयावह हो सकता है, बेंगलुरू की ये खबर गवाह है। कॉन्फिडेंट ग्रुप के चेयरमैन चिरियनकांडथ जोसेफ रॉय, जिनकी संपत्ति 9 हजार करोड़ की थी, ने अपनी पिस्टल से खुद को गोली मार ली। दुनिया की महंगी गाड़ियों का कलेक्शन, प्राइवेट जेट, कर्जमुक्त जिंदगी – सब कुछ था उनके पास। फिर ये कदम क्यों? आखिर क्या राज था जो चमकती जिंदगी के पीछे छिपा था? आइए, इस खरबपति की खुदकुशी का DNA टेस्ट करते हैं…

बेंगलुरू का रिचमंड सर्कल। कॉन्फिडेंट ग्रुप का शानदार ऑफिस। बाहर लग्जरी कारें चमक रही हैं। अंदर, पिछले तीन दिनों से इनकम टैक्स की रेड का तूफान। अधिकारी कागजात उलट-पुलट कर रहे थे। कल दोपहर 12 बजे फिर टीम पहुंची। दोपहर 2 बजे सीजे रॉय, वो जिंदादिल बिजनेसमैन, ऑफिस में एंटर हुए। चेहरे पर मुस्कान? या छिपी उदासी? कोई नहीं जानता। ढाई बजे अधिकारियों ने कुछ कागजात थमाए – सिग्नेचर करो। रॉय ने सिर हिलाया। तीन बजे वो बोले, “मां से बात करता हूं।” केबिन में घुसे। दरवाजा बंद। सन्नाटा। सवा तीन बजे… एक तेज धमाका! पिस्टल की गोली। खुद को निशाना बनाया। कर्मचारी दौड़े, दरवाजा तोड़ा। खून से लथपथ रॉय। अस्पताल पहुंचे, लेकिन देर हो चुकी थी। आयकर अधिकारी? रेड बीच में छोड़ भागे। सवाल उठा – क्या छिपा था उस केबिन में? सिर्फ गोली, या कोई डायरी, कोई मैसेज जो सच उजागर कर दे?

रॉय की कहानी किसी फिल्म से कम नहीं। कभी साधारण सेल्समैन थे। एक शोरूम ने धक्के मारकर बाहर निकाला था। लेकिन हार न मानी। मेहनत से कॉन्फिडेंट ग्रुप खड़ा किया। रियल एस्टेट, कंस्ट्रक्शन – दो दशकों में साम्राज्य। 36 साल की उम्र में पहला प्राइवेट जेट खरीदा। फेरारी, लैंबोर्गिनी – महंगी कारों का कलेक्शन जो किसी को हरा दे। जिंदादिल इंसान, पार्टियां, ट्रैवल – जिंदगी फुल ऑन। ऊपर से एक रुपया कर्ज नहीं। तो फिर? क्या टैक्स रेड ने पुराना घाव कुरेदा? या कुछ और गहरा? अफवाहें उड़ीं – ब्लैक मनी का खेल? विदेशी खाते? या फैमिली का दबाव? सियासत शुरू हो गई। विपक्ष चिल्ला रहा – “बिजनेसमैन को टारगेट किया!” सरकार बोली – “रूटीन चेक।” लेकिन सच्चाई? अभी छिपी है।

अब सोचिए… रॉय के केबिन से मिले वो लॉकर। अंदर क्या था? दस्तावेज जो 9 हजार करोड़ की सच्चाई बयां करें? या कोई पत्र, जो बताए कि धन के पीछे कितना तनाव? पड़ोसी बिजनेसमैन फुसफुसा रहे – “रॉय अकेलेपन से जूझ रहे थे।” फैमिली साइलेंट। पत्नी, बच्चे – सदमे में। क्या घर में कोई झगड़ा? या बिजनेस पार्टनर का विश्वासघात? याद कीजिए, कॉन्फिडेंट ग्रुप के कई प्रोजेक्ट्स विवादों में फंसे। लैंड डील्स, एनओसी स्कैम – क्या पुरानी फाइलें टैक्स टीम को मिल गईं? रॉय ने आखिरी कॉल मां को की। क्या बोले? “मां, सब खत्म?” वो कॉल रिकॉर्डिंग होगी? पुलिस जांच में खुलासा होगा। लेकिन तब तक सस्पेंस बरकरार। क्या रॉय की मौत सिर्फ टैक्स का डर थी, या धन-लोभ का काला चेहरा?

ये घटना बजट से पहले चेतावनी है। धन कमाओ, लेकिन सीमा लांघो मत। रॉय जैसे खरबपति भी टूट गए। अब सवाल – अगला नंबर किसका? जांच आगे बढ़ेगी। पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट, फॉरेंसिक – हर कोने से सच निकलेगा। क्या ब्लैकमनी का पर्दाफाश? या मेंटल हेल्थ का मुद्दा? बेंगलुरू पुलिस ने केस दर्ज किया। सीबीआई एंट्री लेगी? इंतजार कीजिए… ये राज धीरे-धीरे खुलेगा। फिलहाल, रॉय की जिंदगी एक सबक – चमक के पीछे अंधेरा हो सकता है।

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