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छत्तीसगढ़ शराब घोटाला: सुप्रीम कोर्ट से कवासी लखमा को बड़ी राहत, मिली अंतरिम जमानत

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रायपुर। छत्तीसगढ़ के बहुचर्चित शराब घोटाले में पूर्व आबकारी मंत्री और मौजूदा विधायक कवासी लखमा को सुप्रीम कोर्ट से बड़ी राहत मिली है। शीर्ष अदालत ने मामले की सुनवाई के बाद उन्हें अंतरिम जमानत देने का आदेश दिया है। करीब एक साल से जेल में बंद लखमा अब जल्द ही रिहा होंगे।

मंगलवार को सुप्रीम कोर्ट में इस मामले की सुनवाई हुई। मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जॉयमाला बाक्ची और न्यायमूर्ति पंचोली की पीठ ने प्रवर्तन निदेशालय (ED) और आर्थिक अपराध अन्वेषण ब्यूरो (EOW) से जुड़े मामलों पर एक साथ सुनवाई की। इसके बाद अदालत ने लखमा को जमानत प्रदान की।

एक साल बाद जेल से बाहर आएंगे लखमा

प्रवर्तन निदेशालय ने कवासी लखमा को 15 जनवरी 2025 को गिरफ्तार किया था। गिरफ्तारी के बाद ED ने उन्हें 7 दिन की रिमांड पर लेकर पूछताछ की थी। इसके बाद उन्हें न्यायिक हिरासत में भेज दिया गया था और वे तब से रायपुर सेंट्रल जेल में बंद थे। सुप्रीम कोर्ट के ताज़ा आदेश के बाद अब उनके जेल से बाहर आने का रास्ता साफ हो गया है।

गिरफ्तारी की वजह क्या थी?

ED के अनुसार, कवासी लखमा कथित शराब सिंडिकेट के एक अहम हिस्सेदार थे। जांच एजेंसी का दावा है कि उनके निर्देश पर यह नेटवर्क काम करता था और आबकारी नीति में बदलाव के ज़रिए सिंडिकेट को फायदा पहुंचाया गया।

ED का कहना है कि लखमा की भूमिका से ही छत्तीसगढ़ में FL-10 लाइसेंस प्रणाली लागू हुई। एजेंसी के मुताबिक, आबकारी विभाग में चल रही अनियमितताओं की जानकारी होने के बावजूद लखमा ने उन्हें रोकने के लिए कोई ठोस कदम नहीं उठाया।

हर महीने कमीशन मिलने का आरोप

ED के वकील ने अदालत में दावा किया था कि कथित शराब घोटाला करीब तीन वर्षों तक चला। इस दौरान कवासी लखमा को हर महीने लगभग 2 करोड़ रुपये की अवैध रकम मिली। इस तरह कुल राशि करीब 72 करोड़ रुपये बताई गई है।

जांच एजेंसी के अनुसार, इस पैसे का इस्तेमाल लखमा के बेटे के मकान निर्माण और सुकमा में कांग्रेस भवन के निर्माण में किया गया।

क्या है छत्तीसगढ़ शराब घोटाला?

छत्तीसगढ़ शराब घोटाले की जांच फिलहाल प्रवर्तन निदेशालय कर रही है। ED ने इस मामले में ACB में FIR दर्ज कराई है, जिसमें 2,000 करोड़ रुपये से अधिक के घोटाले का आरोप लगाया गया है।

जांच में सामने आया है कि तत्कालीन भूपेश बघेल सरकार के कार्यकाल में कुछ वरिष्ठ अधिकारी और कारोबारी एक कथित सिंडिकेट के जरिए इस घोटाले को अंजाम दे रहे थे। आरोप है कि इस पूरे नेटवर्क से सरकारी खजाने को भारी नुकसान हुआ और अवैध कमाई नेताओं, अधिकारियों व कारोबारियों के बीच बांटी गई।

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