-राष्ट्रपति के आगमन से उत्साहित है बस्तर का आदिवासी समुदाय =
-आज संभाग स्तरीय बस्तर पंडुम का उद्घाटन करेंगी राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू =
-आदिवासी संस्कृति का संभाग स्तरीय समागम =
-अर्जुन झा-
जगदलपुर। बस्तर की माटी की खुशबू निराली है। यहां कण कण में समृद्ध आदिवासी संस्कृति और परंपराएं समाहित हैं। यहां के लोगों का आतिथ्य स्वागत करने का नजरिया और स्नेह भी बेमिसाल है।यही वजह है कि बस्तर की धरती पर आकर विदेशी मेहमान भी आम बस्तरिहा की जीवन शैली के मुरीद बन जाते हैं। दशकों तक माओवादी हिंसा का दंश झेलते आए बस्तर में अब केंद्र एवं राज्य सरकारों की दृढ़ इच्छाशक्ति और पुलिस एवं सुरक्षा बलों के निर्णायक अभियानों के चलते जहां बस्तर में अमन की बयार बहने लगी है, वहीं विकास की नई गाथा भी लिखी जा रही है। बस्तर ओलंपिक और बस्तर पंडुम जैसे उत्सवी आयोजनों में साल दर साल बढ़ती जन सहभागिता बस्तर में बिखरते उल्लास की दास्तां सुना रही हैं। बस्तर पंडुम अब बस्तर का महापर्व बन गया है। पिछले कई दिनों से बस्तर संभाग में बस्तर पंडुम की धूम मची है। पंचायत, ब्लॉक और जिला स्तरीय आयोजनों के बाद अब संभाग स्तरीय बस्तर पंडुम का आयोजन 7 जनवरी से आदिवासियों एवं बस्तर के आमजन की परम आराध्या माई दंतेश्वरी की नगरी जगदलपुर में होने जा रहा हैं। आदिवासी बाहुल्य बस्तर के लिए यह निश्चय ही गर्व की बात है कि इस महापर्व का उद्घाटन राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू करेंगी जो स्वयं आदिवासी समुदाय से हैं।

बस्तर की समृद्ध जनजातीय संस्कृति और परंपराएं एक बार फिर विश्व पटल पर अपनी छाप छोड़ने को तैयार हैं। 7 से 9 फरवरी तक आयोजित होने वाले संभाग स्तरीय बस्तर पंडुम 2026 को लेकर अंचल के निवासियों में अभूतपूर्व उत्साह है। इस वर्ष के आयोजन ने लोकप्रियता के पुराने सभी पैमाने ध्वस्त कर दिए हैं और यह केवल एक प्रतियोगिता न रहकर अब लोक संस्कृति के एक विशाल उत्सव और महापर्व का रूप ले चुका है। इसमें सहभागिता के आंकड़ों पर नजर डालें तो यह आयोजन इस बार एक ऐतिहासिक कीर्तिमान स्थापित कर रहा है। वर्ष 2025 में जहां विकासखंड स्तरीय प्रतियोगिताओं में 15 हजार 596 लोगों ने सहभागिता दर्ज कराई थी, वहीं इस वर्ष यह आंकड़ा संभाग के सातों जिलों में तीन गुना से भी अधिक बढ़कर 54 हजार 745 तक पहुंच गया है। प्रतिभागियों की संख्या में आया यह भारी उछाल स्पष्ट करता है कि बस्तर के लोग अपनी जड़ों, परंपराओं और लोक कलाओं को सहेजने के लिए कितने जागरूक और उत्साहित हो चुके हैं। विशेष रूप से अति नक्सल प्रभावित दंतेवाड़ा जिले ने 24 हजार 267 पंजीयन के साथ पूरे संभाग में सर्वाधिक भागीदारी का रिकॉर्ड बनाया है। इसके बाद कांकेर, बीजापुर और सुकमा जैसे जिलों ने भी हजारों की संख्या में अपनी दमदार उपस्थिति दर्ज कराई है। इस भारी उत्साह के बीच, अब सभी की निगाहें 7 से 9 फरवरी तक होने वाली संभाग स्तरीय प्रतियोगिताओं पर टिकी हैं। जिला स्तर की कड़ी प्रतिस्पर्धा से जीत कर आए 84 दल और उनके 705 चयनित कलाकार इस दौरान अपनी कला का जादू बिखरेंगे। इन तीन दिनों में बस्तर की फिजां में जनजातीय नृत्य की थाप, पारंपरिक गीतों की गूंज, स्थानीय व्यंजन-पेय पदार्थों और नाटकों का मंचन आकर्षण का मुख्य केंद्र रहेंगें। प्रतियोगिता में 12 अलग-अलग विधाओं का प्रदर्शन होगा, जिसमें सर्वाधिक 192 कलाकार जनजातीय नृत्य में और 134 कलाकार जनजातीय नाटक सहित अन्य विधाओं में हुनर दिखाएंगे।
ज्ञान, कला और स्वाद का संगम
यह मंच केवल मनोरंजन तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि यह बस्तर के ज्ञान, स्वाद और कला का एक अद्भुत संगम भी होगा। जहां एक ओर 65 कलाकार पारंपरिक वाद्ययंत्रों की धुन छेड़ेंगे, वहीं दूसरी ओर 56 प्रतिभागी लजीज जनजातीय व्यंजनों की खुशबू से माहौल को सराबोर करेंगे। इसके अतिरिक्त, बस्तर की दुर्लभ वन औषधियों, चित्रकला, शिल्प कला, आभूषण और आंचलिक साहित्य का प्रदर्शन भी किया जाएगा, जो नई पीढ़ी को अपनी विरासत से रूबरू कराएगा।
इस आयोजन की एक और सबसे खूबसूरत तस्वीर मातृशक्ति की बढ़ती भागीदारी है। संभाग स्तर पर पहुंचने वाले 705 प्रतिभागियों में महिला और पुरुष कलाकारों की संख्या में गजब का संतुलन। इसमें 340 महिलाएं और 365 पुरुष शामिल हैं। यह भागीदारी बताती है कि बस्तर की संस्कृति को आगे ले जाने और उसे संरक्षित करने में यहां की महिलाएं पुरुषों के साथ कंधे से कंधा मिलाकर चल रही हैं। कुल मिलाकर, बस्तर पंडुम 2026 अपनी भव्यता और जन-भागीदारी के साथ एक अविस्मरणीय आयोजन बनने की ओर अग्रसर है।
संस्कृति को सहेजने की पहल
बस्तर की आदिम संस्कृति, पारंपरिक खानपान और अनूठी जीवनशैली को सहेजने के उद्देश्य से आयोजित हो रहे ‘बस्तर पंडुम के जिला स्तरीय महोत्सव का जगदलपुर के सिटी ग्राउंड में हुआ आयोजन अनूठी छाप छोड़ गया। मांदर की थाप और लोकगीतों की गूंज के बीच आयोजित इस गरिमामय समारोह की शुरुआत सांसद महेश कश्यप, प्रदेश भाजपा अध्यक्ष एवं जगदलपुर विधायक किरण सिंह देव, चित्रकोट विधायक विनायक गोयल और महापौर संजय पांडे ने किया था। आज हम बस्तर की जिस समृद्ध विरासत पर गर्व करते हैं, उस संस्कृति को बचाने में लाखों पीढ़ियां खप गईं और इसे बाहरी आक्रमणों से बचाने के लिए हजारों पीढ़ियों ने अपना बलिदान दिया है। शत्रु जिस राष्ट्र को समाप्त करना चाहते हैं, सबसे पहले शत्रु उस राष्ट्र की संस्कृति को नष्ट करते हैं। नई पीढ़ी अब अपनी मूल संस्कृति, खानपान और रहन-सहन को भुलाने लगी हैं, ऐसे में मुख्यमंत्री विष्णु देव साय ने इसे संरक्षित करने का जो बीड़ा उठाया है, वह निश्चय ही सराहनीय है। बस्तर के नैसर्गिक सौंदर्य और यहां के निवासियों की सादगी का सजीव चित्रण अब हमें बस्तर पंडुम के आयोजनों में देखने को मिल रहा है। हमारा बस्तर अद्भुत प्राकृतिक सुषमा से परिपूर्ण है। यहां की नदियां, जल प्रपात, घने जंगल और लोक जीवनशैली बरबस आकर्षित करती हैं। बस्तर पंडुम में जनजातीय शिल्पों, व्यंजनों, पेय पदार्थों और कला कृतियों का अनूठा संगम देखने को मिलता है।
वनौषधियों को मिली नई पहचान
बस्तर अंचल की आदिम संस्कृति, पारंपरिक खान-पान और रीति-रिवाजों को वैश्विक पटल पर लाने के उद्देश्य से जिले के अलग-अलग विकासखंडों में बस्तर पंडुम का भव्य आयोजन किया गया। दरभा विकासखंड के छिंदावाड़ा, बास्तानार के बड़े किलेपाल और तोकापाल के छोटे आरापुर में आयोजित इस उत्सव में जनसैलाब उमड़ पड़ा था। इस दौरान जनप्रतिनिधियों ने बस्तर की विरासत को भावी पीढ़ी तक पहुंचाने का संकल्प लिया। छिंदावाड़ा में आदिवासी संस्कृति और परंपरा का एक ऐसा अनूठा संगम देखने को मिला, जिसने बस्तर की सोंधी मिट्टी की महक से रूबरू करा दिया। कार्यक्रम की शुरुआत आस्था और विश्वास के प्रतीक माई दंतेश्वरी की पूजा-अर्चना और आंगादेव की आराधना के साथ हुई। पारंपरिक धुरवा नृत्य ने बस्तर की आदिम संस्कृति की ऐसी छटा बिखेरी कि दर्शक मंत्रमुग्ध हो उठे।खान-पान के शौकीनों के लिए यह आयोजन किसी दावत से कम नहीं था। यहां बस्तर के वनों में पाए जाने वाले दुर्लभ कंद-मूलों की एक विस्तृत श्रृंखला प्रदर्शित की गई, जिसमें कोचई, तरगारिया, डेंस, कलमल, पीता, सोरेंदा, जिमी और नागर कांदा शामिल थे। इन कंदों ने जहां लोगों को प्रकृति के उपहारों से परिचित कराया, वहीं पारंपरिक व्यंजनों ने भी खूब वाहवाही बटोरी। जोंधरी लाई के लड्डू की मिठास और जोंधरा, मंडिया व पान बोबो जैसे पारंपरिक पकवानों का स्वाद चखकर लोग अभिभूत हो गए। गुड़ बोबो की मिठास के साथ तीखुर बर्फी और भेंडा चटनी ने भोजन प्रेमियों को एक अविस्मरणीय जायका प्रदान किया। भेंडा फूल से बने शरबत ने भी विशेष आकर्षित किया। स्वाद और संस्कृति के इस मेले में स्वास्थ्य और पुरानी चिकित्सा पद्धति को भी विशेष स्थान दिया गया। हड़जोड़, देवसंड, कामराज, काली धतूरा और कोचेल छाली जैसी औषधियों के माध्यम से वनौषधियों के महत्व को समझाया गया।
प्रकृति का अनूठा चितेरा भगत
जगदलपुर के सिटी ग्राउंड में आयोजित ‘बस्तर पंडुम’ महज एक आयोजन नहीं, बल्कि हुनर के प्रदर्शन का अवसर भी साबित हुआ, जहाँ दरभा विकासखंड के नेगानार निवासी चित्रकार भगत राम बघेल ने अपनी कला का ऐसा जादू बिखेरा कि हर कोई दंग रह गया। संसाधनों की चमक-धमक से दूर, भगत राम ने साबित किया कि सच्ची कला बाजार में मिलने वाले महंगे रंगों की मोहताज नहीं होती। प्रतियोगिता के दौरान भगत राम ने प्रकृति की गोद से लिए हुए उपहारों को अपनी चित्रकारी का माध्यम बनाया। उन्होंने अपनी पेंटिंग में सेमी पत्ता, लाल भाजी, शलजम, हल्दी, रंगीन पत्थर, अपराजिता के फूल और लकड़ी के कोयले जैसे पूरी तरह से प्राकृतिक अवयवों का उपयोग किया। इन साधारण सी दिखने वाली वस्तुओं के मिश्रण से उन्होंने कैनवास पर ऐसे आकर्षक और जीवंत चित्र उकेरे, जो किसी भी महंगे सिंथेटिक रंग की चमक को फीका करने में सक्षम थे। अपराजिता के फूलों से नीला, लाल भाजी से लाल, हल्दी से पीला और लकड़ी के कोयले से काला रंग बनाकर उन्होंने प्रकृति के रंगों को हूबहू कागज पर उतार दिया।इस अनोखी विधा के आविष्कार के पीछे की कहानी संघर्ष और गुरु-शिष्य परंपरा की एक मिसाल है। भगत राम बताते हैं कि एक बार चित्रकारी करते समय उनके पास रंगों की कमी हो गई थी और बाजार से रंग खरीदने के साधन उपलब्ध नहीं थे। उस कठिन समय में हार मानने के बजाय, उन्होंने अपने स्वर्गीय गुरु बीआर बघेल ने प्रेरित करते हुए प्रकृति की ओर रुख करने के लिए कहा। गुरु की सीख से प्रेरित होकर उन्होंने आसपास मौजूद वनस्पतियों व पत्थरों से ही रंग तैयार करने का अनूठा उपाय खोज निकाला। भगत राम की यह चित्रकारी न केवल बस्तर की अद्भुत कला संस्कृति और नवाचार का परिचय देती है, बल्कि यह संदेश भी देती है कि यदि हौसला बुलंद हो, तो अभाव में भी सृजन की नई और खूबसूरत राहें खोजी जा सकती हैं।









