हारून रशीद| किरंदुल
किरन्दुल की सड़कों पर कल सिर्फ़ पाँच बुलेट नहीं रोकी गईं—
दरअसल, पाँच चलती-फिरती “ध्वनि की दादागिरी” को लगाम दी गई।
वो आवाज़…
जो खुद को रौब समझती थी,
असल में शहर के कानों पर हमला थी—
बुज़ुर्गों की धड़कन बढ़ाने वाली,
मरीजों की नींद तोड़ने वाली,
और बच्चों की पढ़ाई चीरने वाली।
ये कस्टमाइज्ड सायलेंसर नहीं थे—
ये कुछ युवाओं की वो मानसिकता थी,
जो शोर को शौक
और असुविधा को स्टेटस समझ बैठी थी।
असल ‘रौब’ सायलेंसर में नहीं—
शख्सियत की ख़ामोशी में होता है।
पाण्डेय बेचन शर्मा ‘उग्र’ होते तो शायद लिखते—
“ये लौह घोड़े नहीं,
असभ्यता के नगाड़े थे,
जो हर मोड़ पर ऐलान करते फिरते थे—
हमें कानून नहीं, कान फाड़ना आता है।”
पर कल…
जब पुलिस ने एक-एक सायलेंसर उतरवाया,
तो सिर्फ़ लोहे का टुकड़ा नहीं उतरा—
घमंड की एक परत भी उखड़ी,
और सड़क ने पहली बार चैन की साँस ली।
25 हज़ार का जुर्माना रकम कम थी,
पर संदेश भारी था—
सड़क तुम्हारी जागीर नहीं,
शहर तुम्हारा स्टेज नहीं,
और आवाज़ तुम्हारा हथियार नहीं।
सोचिए…
जब सायलेंसर उतरे होंगे,
तो पहली बार उन बाइकों ने भी
अपनी असली आवाज़ सुनी होगी—
वो जो मशीन की थी,
दादागिरी की नहीं।
ये कार्रवाई चालान भर नहीं—
शहर के सुकून का पोस्टमार्टम थी,
जिसमें अपराधी ‘शोर’ था
और पीड़ित आम आदमी की नींद।
किरन्दुल ने कल एक छोटी राहत ली—
और कानून ने धीरे से फुसफुसाया:
“शोर कितना भी कस्टमाइज्ड क्यों न हो…
कानून का सन्नाटा उससे हमेशा भारी होता है।”









