Home मुख्य ख़बरें 12 फ़रवरी: एक जन्मदिन नहीं… इतिहास की दिशा बदलने वाला दिन

12 फ़रवरी: एक जन्मदिन नहीं… इतिहास की दिशा बदलने वाला दिन

2
0

12 फ़रवरी 1809।
केंटकी, अमेरिका।

जंगल के किनारे लकड़ी की एक झोपड़ी। बाहर कड़ाके की ठंड। अंदर टिमटिमाती लालटेन।
न डॉक्टर। न दवा। न सुविधा।

उसी अधूरे उजाले में एक बच्चे का जन्म हुआ —
नाम रखा गया: अब्राहम लिंकन।

किसी ने नहीं सोचा था — यह बच्चा एक दिन दुनिया की सबसे शक्तिशाली कुर्सी पर बैठेगा।


बचपन: जहाँ सपने भूख से बड़े थे

लिंकन का बचपन गरीबी में बीता।
जूते नहीं थे। किताबें उधार की थीं।
दिन में खेत और लकड़ी का काम, रात में लालटेन की रोशनी में पढ़ाई।

लोग हँसते थे —
“लकड़हारे का बेटा वकील बनेगा?”
“झोपड़ी वाला देश चलाएगा?”

वो जवाब नहीं देता था।
वो पढ़ता था।


संघर्ष: हार जिसने हार नहीं मानी

राजनीति में कदम रखा — और लगातार असफलताएँ मिलीं।

  • 1832 — चुनाव हारे
  • 1833 — व्यापार में नुकसान
  • 1835 — निजी त्रासदी
  • 1848, 1854, 1858 — बड़ी राजनीतिक हार

बार-बार हार।
बार-बार उपहास।

लेकिन एक बात स्थिर रही —
वो मैदान छोड़कर नहीं भागे।

1860 में — वही व्यक्ति अमेरिका का राष्ट्रपति चुना गया।


एक दस्तख़त… जिसने सदियाँ बदल दीं

राष्ट्रपति बनने के बाद उनका सामना उस सच्चाई से हुआ जिसे दुनिया नज़रअंदाज़ कर रही थी —
गुलामी।

हाथों में बेड़ियाँ। इंसान की ख़रीद-फरोख़्त।

1 जनवरी 1863 —
उन्होंने “Emancipation Proclamation” पर हस्ताक्षर किए।

यह सिर्फ़ एक कानूनी दस्तावेज़ नहीं था।
यह घोषणा थी — कि इंसान की कीमत बाज़ार तय नहीं करेगा।

उस दस्तख़त ने लाखों गुलामों को स्वतंत्रता की राह दी —
और देश को गृहयुद्ध की आग में झोंक दिया।


युद्ध: बाहर भी, भीतर भी

अमेरिका जल रहा था।
भाई-भाई के ख़िलाफ़ खड़ा था।

लिंकन पर सवाल उठे। आलोचना हुई।
लेकिन उनका लक्ष्य साफ़ था —
देश को जोड़ना है। गुलामी को खत्म करना है।

1865 में युद्ध समाप्त हुआ।
संघ (Union) बच गया।
गुलामी की व्यवस्था टूट चुकी थी।


14 अप्रैल 1865 — थिएटर की वह रात

फोर्ड थिएटर, वॉशिंगटन डी.सी.
राष्ट्रपति अपनी पत्नी के साथ नाटक देखने पहुँचे।

हँसी गूंजी।
और उसी क्षण — गोली चली।

जॉन विल्क्स बूथ ने उन्हें गोली मार दी।
अगले दिन — 15 अप्रैल 1865 —
अब्राहम लिंकन नहीं रहे।


लेकिन कहानी यहीं खत्म नहीं होती

वो सत्ता से बड़े साबित हुए।
उन्होंने दिखाया —
नेतृत्व पद से नहीं, सिद्धांत से जन्म लेता है।

आज जब दुनिया नस्ल, धर्म और पहचान के आधार पर बँटती है —
तो लिंकन की कहानी एक सवाल बनकर खड़ी होती है:

क्या हम सच में बराबरी पर विश्वास करते हैं?
या सिर्फ़ उसका दावा करते हैं?


12 फ़रवरी — सिर्फ़ एक जन्मदिन नहीं।
यह याद दिलाने का दिन है —
कि साधारण परिस्थितियों में जन्मा एक व्यक्ति
दुनिया की नैतिक दिशा बदल सकता है।

और शायद…
इतिहास आज भी इंतज़ार कर रहा है —
अगले लिंकन का।

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here