= धुर नक्सल प्रभावित क्षेत्र में एकबार फिर प्रज्वलित हो उठी है आस्था की लौ =
= केरलापेंदा के राम मंदिर में 21 साल बाद हुआ हवन-पूजन, दीपिका शोरी ने दी आहूति =
-अर्जुन झा-
जगदलपुर। वैसे तो भगवान श्रीराम को माता कैकेयी के पुत्रमोह के कारण 14 वर्षों का वनवास हुआ था, मगर बस्तर के ‘रामजी’ को तो 21 साल का वनवास भोगना पड़ा। 21 बरस बाद जब श्रीरामचंद्र, माता सीता और लखन जी की घर में वापसी हुई तो गांव वालों की आंखों से श्रद्धा और खुशी के आंसू बरसने लगे।केरलापेंदा सहित आसपास के गांवों में तो जैसे दशहरा दीपावली का उल्लास बिखर पड़ा। गांव वालों ने उत्साह के साथ हवन पूजन का आयोजन किया। हवन पूजन में राज्य महिला आयोग की सदस्य दीपिका शोरी भी विशेष रूप से शामिल हुईं। सुश्री शोरी ने यज्ञ में आहुतियां भी दीं।
बस्तर संभाग के सुकमा जिला मुख्यालय से लगभग 100 किलोमीटर और चिंतलनार कस्बे से लगभग 7 किलोमीटर अंदर स्थित ग्राम पंचायत केरलापेंदा का प्राचीन राम मंदिर अब पुनः भक्ति और श्रद्धा का केंद्र बन गया है।करीब 21 वर्षों तक सूने पड़े इस मंदिर में सामूहिक हवन-पूजन और वैदिक मंत्रोच्चार की गूंज सुनाई दी। ग्रामीणों के अनुसार नक्सल दबाव के कारण मंदिर में पूजा-अर्चना बंद कर दी गई थी। मंदिर परिसर में न केवल सन्नाटा छा गया था, बल्कि वहां नक्सलियों की बैठकों का दौर भी शुरू हो गया था, जिससे ग्रामवासियों के मन में भय का वातावरण बना रहता था। ग्रामीण बताते हैं कि मंदिर का निर्माण वर्ष 1978 में किया गया था। राजस्थान से भगवान श्रीराम, लखनजी (लक्ष्मण) और माता सीता की प्रतिमाएं लाकर विधिवत स्थापना की गई थी। प्रतिमाओं की मनोहारी छवि आज भी श्रद्धालुओं को आकर्षित करती है। जैसे ही कोई भक्त मंदिर में प्रवेश करता है, वातावरण स्वतः ही राममय हो उठता है। पिछले वर्ष सीआरपीएफ के सहयोग से मंदिर के द्वार पुनः खोले गए। इसके बाद से धीरे-धीरे पूजा-पाठ प्रारंभ हुआ और अब 21 वर्षों बाद पहली बार सामूहिक एक कुंडीय यज्ञ का आयोजन किया गया।

आस्था को दबाया नहीं जा सकता: दीपिका
इस ऐतिहासिक धार्मिक अनुष्ठान में छत्तीसगढ़ राज्य महिला आयोग की सदस्य अधिवक्ता दीपिका शोरी विशेष रूप से शामिल हुईं। उन्होंने ग्रामवासियों और रामभक्तों के साथ मिलकर यज्ञ में आहुति दी और क्षेत्र में शांति, सद्भाव और समृद्धि की कामना की। इस अवसर दीपिका शोरी ने कहा कि आस्था को दबाया जा सकता है, समाप्त नहीं किया जा सकता। आस्था आत्मा में बसी रह कर अजर अमर रहती है। आज केरलापेंदा इसका जीवंत उदाहरण है। उन्होंने ग्रामीणों को आश्वस्त किया कि आपकी सुरक्षा, उत्थान और नक्सल प्रभावित गांवों के समग्र विकास के लिए राज्य एवं केंद्र सरकारें पूरी प्रतिबद्धता के साथ काम कर रही हैं।

धर्ममय हुआ धुर नक्सल प्रभावित क्षेत्र
केरलापेंदा में आयोजित धार्मिक अनुष्ठान केवल पूजा-पाठ तक सीमित नहीं रहा, बल्कि यह एक सामाजिक जागरण और सामूहिक एकता का प्रतीक बन गया। जब जिले के विभिन्न क्षेत्रों तोंगपाल, मारेंगा, कूकानार, पाकेला, सुकमा, पोलमपल्ली, दोरनापाल, सौतनार सहित अन्य स्थानों से रामभक्तों की टोलियां केसरिया और पीले वस्त्र धारण कर मंदिर पहुंचीं, तो पूरा गांव भक्ति के रंग में सराबोर हो गया। गांव की गलियां, मंदिर परिसर और आसपास का वातावरण जय श्रीराम के उद्घोष से गूंज उठा। ऐसा प्रतीत हो रहा था मानो वर्षों से दबी आस्था आज एकसाथ फिर फूट पड़ी हो। महिलाएं मंगलगीत गा रही थीं, युवा ध्वज लेकर चल रहे थे और बुजुर्गों की आंखों में संतोष एवं श्रद्धा के आंसू साफ दिखाई दे रहे थे।
नक्सलियों ने बंद कराया था मंदिर
ग्रामीणों ने बताया कि एक समय ऐसा था जब नक्सलियों के दबाव में मंदिर के पट बंद कर दिए गए थे। पुजारी को भगवान राम की पूजा अपने घर पर करनी पड़ती थी। मंदिर परिसर में नक्सल बैठकों के कारण लोग भयभीत रहते थे और सार्वजनिक रूप से धार्मिक आयोजन करना संभव नहीं था। परंतु अब स्थिति बदल रही है। सुरक्षा बलों की सक्रियता और ग्रामीणों के साहस ने माहौल को धीरे-धीरे सामान्य बनाया है। आज वही स्थान, जो कभी भय का प्रतीक था, अब श्रद्धा और सामूहिक विश्वास का केंद्र बन गया है। इस आयोजन में रामदेव नाग, हेमला मुका मांझी, भीमा पिडमेल के मांझी, हेमला जोगा, नुको देवा पेरमा, मड़कम देवा, मुचाकी पोजा पटेल, आयुषी रवा, जगनाथ, संतोष पुराणिक सहित अनेक जनप्रतिनिधि और ग्रामीण प्रमुख रूप से उपस्थित रहे।
लाल सलाम से वैदिक मंत्रों तक
ग्राम पंचायत केरलापेंदा का राम मंदिर अब केवल एक धार्मिक स्थल नहीं, बल्कि बदलते सामाजिक और सुरक्षा परिदृश्य का सशक्त प्रतीक बन गया है। दो दशक पहले जिस मंदिर में पूजा-अर्चना बंद हो गई थी और जहां नक्सलियों की बैठकें होती थीं, लाल सलाम की गूंज सुनाई देती थी, आज वहां वैदिक मंत्रों की ध्वनि और हवन की सुगंध फैल रही है। ग्रामीणों के अनुसार वर्ष 1978 में निर्मित इस मंदिर ने कई उतार-चढ़ाव देखे हैं। आस्था पर लगे नक्सल प्रतिबंध ने लोगों के मन को आहत किया था। धार्मिक स्वतंत्रता पर लगा यह विराम गांव की सामाजिक संरचना को भी प्रभावित कर गया था।पिछले वर्ष केंद्रीय रिज़र्व पुलिस बल के सहयोग से मंदिर को पुनः खोला गया। इसके बाद से नियमित पूजा-पाठ प्रारंभ हुआ और अब पहली बार हुए सामूहिक हवन-पूजन के आयोजन ने यह स्पष्ट संदेश दिया है कि क्षेत्र में शांति और सामान्य स्थिति लौट रही है। इस अवसर पर छत्तीसगढ़ राज्य महिला आयोग की सदस्य अधिवक्ता दीपिका शोरी ने अपने संबोधन में कहा कि जहां कभी भय और असुरक्षा का वातावरण था, वहां आज श्रद्धा और विश्वास का प्रकाश फैल रहा है। यह केवल धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि सामाजिक पुनर्जागरण का संकेत है। 21 वर्षों बाद आयोजित इस एक कुंडीय यज्ञ में सैकड़ों श्रद्धालुओं ने भाग लिया। गांव के बुजुर्गों ने इसे ऐतिहासिक क्षण बताया और युवाओं ने इसे नई शुरुआत का प्रतीक माना। आज केरलापेंदा का राम मंदिर यह संदेश दे रहा है कि परिस्थितियां चाहे कितनी भी कठिन क्यों न हों, जब समाज एकजुट होता है तो आस्था, संस्कृति और परंपरा पुनः जीवित हो उठती है।









