Home चर्चा में स्वयं से संतुष्टि की साधना : शांति की ओर एक अंतर्मुखी यात्रा

स्वयं से संतुष्टि की साधना : शांति की ओर एक अंतर्मुखी यात्रा

2
0
बस्तर संवाददाता – अर्जुन झा
मनुष्य के जीवन में यदि कोई सबसे कठिन साधना है, तो वह है – स्वयं से संतुष्ट हो पाना। संसार की भीड़ में हम अक्सर दूसरों की स्वीकृति, प्रशंसा और प्रेम की तलाश में भटकते रहते हैं, परंतु आत्म–संतुष्टि की यात्रा भीतर की ओर जाती है। यह यात्रा शोर से मौन की ओर, अपेक्षा से स्वीकृति की ओर और अशांति से शांति की ओर ले जाती है।
आत्म–संतुष्टि कोई बाहरी उपलब्धि नहीं है। यह कोई पद, प्रतिष्ठा या संपत्ति नहीं, जिसे अर्जित कर लिया जाए। यह तो एक गहरा अनुभव है – जब हम अपने निर्णयों, अपने कर्मों और अपनी परिस्थितियों को बिना किसी ग्लानि के स्वीकार कर लेते हैं। जब हम स्वयं को दोष देने के बजाय समझने लगते हैं, तब आत्मा में एक हल्की-सी मुस्कान जन्म लेती है। वही मुस्कान आत्म–संतुष्टि का प्रथम संकेत होती है।
आज का मनुष्य निरंतर तुलना के दंश से पीड़ित है। वह दूसरों की सफलता को अपने अपूर्ण होने का प्रमाण मान बैठता है। परंतु क्या सचमुच जीवन एक प्रतियोगिता है? क्या हर आत्मा का मार्ग एक जैसा होता है? नहीं। प्रत्येक व्यक्ति का जीवन एक अलग कहानी है, जिसकी गति, संघर्ष और उपलब्धियाँ भिन्न हैं। जब हम इस सत्य को स्वीकार करते हैं, तब भीतर का बोझ हल्का होने लगता है।
शांति भी बाहर नहीं मिलती। वह किसी तीर्थस्थल की धूल में नहीं, बल्कि हमारे विचारों की पवित्रता में छिपी होती है। जब मन इच्छाओं के अनंत जाल में उलझ जाता है, तब अशांति जन्म लेती है। इच्छा स्वयं में बुरी नहीं है, परंतु जब वह अनियंत्रित हो जाती है, तब वह हमें थका देती है। शांति पाने के लिए हमें अपनी इच्छाओं को समझना और उन्हें सीमित करना सीखना होगा।
आत्म–संतुष्टि का संबंध आत्म–स्वीकृति से है। हम अक्सर अपने दोषों से घृणा करते हैं और उन्हें छिपाने का प्रयास करते हैं। परंतु जब हम अपनी अपूर्णताओं को भी प्रेम से स्वीकार कर लेते हैं, तब मन में एक सहजता आ जाती है। यही सहजता शांति का आधार है। जो व्यक्ति स्वयं से संतुष्ट है, वही संसार से भी संतुष्ट रह सकता है।
जीवन में संघर्ष अनिवार्य हैं। पीड़ा, असफलता और निराशा हमारे साथ चलती हैं। परंतु इन सबके बीच यदि हम अपने भीतर एक छोटा-सा दीपक जला सकें – विश्वास का, धैर्य का और आत्म–सम्मान का – तो अंधकार हमें पूरी तरह निगल नहीं सकता। वह दीपक हमें याद दिलाता है कि हम परिस्थितियों के दास नहीं, बल्कि अपने विचारों के स्वामी हैं।
शांति कोई निष्क्रियता नहीं है। यह पलायन नहीं, बल्कि सजगता है। यह उस वृक्ष की तरह है, जो आंधी में भी अपनी जड़ों को थामे रहता है। बाहर चाहे कितना भी कोलाहल हो, भीतर का मौन अडिग रह सकता है। और जब भीतर मौन होता है, तभी जीवन की हर ध्वनि मधुर लगने लगती है।
अंततः आत्म–संतुष्टि और शांति एक ही वृक्ष की दो शाखाएँ हैं। संतुष्टि हमें वर्तमान में टिकाए रखती है और शांति हमें भविष्य की चिंता से मुक्त करती है। जब हम वर्तमान क्षण को पूर्णतः स्वीकार कर लेते हैं, तब जीवन एक बोझ नहीं, बल्कि एक उत्सव बन जाता है।
मैं यही कह सकती हूँ कि शब्दों की सारी सुंदरता भी उस अनुभूति के सामने फीकी है, जब मन शांत हो और आत्मा संतुष्ट। उस क्षण हम समझ पाते हैं कि सुख बाहर नहीं, बल्कि हमारे भीतर की सरलता और सच्चाई में ही छिपा है।
शायद जीवन का सबसे बड़ा सौंदर्य यही है –
जब हम स्वयं से मिलते हैं और स्वयं में ही शांति पा लेते है।
– भूमिका जैन, सोशल व्याख्याता, सेजस मर्दापाल

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here