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बस्तर-दंडकारण्य में दहशत का चेहरा रहे पूर्व माओवादी नेताओं की नई राजनीतिक पारी की तैयारी, सीएम रेवंत रेड्डी से की मुलाकात

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बस्तर संवाददाता – अर्जुन झा

दशकों तक बस्तर सहित दंडकारण्य क्षेत्र में सक्रिय रहे और सुरक्षा बलों के लिए बड़ी चुनौती माने जाने वाले पूर्व माओवादी नेताओं — देवजी, संग्राम, सुजाता, चंद्रन्ना, दामोदर और गगन्ना — ने आत्मसमर्पण के बाद अब मुख्यधारा की राजनीति की ओर कदम बढ़ा दिए हैं। हाल ही में इन नेताओं ने रेवंत रेड्डी से मुलाकात की। इस दौरान शिवधर रेड्डी (डीजीपी) सहित वरिष्ठ पुलिस अधिकारी भी मौजूद रहे।

आत्मसमर्पण से राजनीति तक

सूत्रों के मुताबिक, आत्मसमर्पण के बाद पुनर्वास प्रक्रिया से गुजर रहे इन पूर्व माओवादी नेताओं में से कम से कम चार नेता आगामी तेलंगाना विधानसभा चुनाव में किस्मत आजमाने की तैयारी में हैं। बताया जा रहा है कि वे विभिन्न राजनीतिक दलों के संपर्क में हैं और संगठनात्मक स्तर पर अपनी भूमिका तय करने की कोशिश कर रहे हैं।

दंडकारण्य और बस्तर क्षेत्र में लंबे समय तक सक्रिय रहे ये नेता कभी माओवादी आंदोलन की रणनीतिक इकाइयों का हिस्सा माने जाते थे। सुरक्षा एजेंसियों के रिकॉर्ड में इन पर कई गंभीर आरोप दर्ज रहे हैं। ऐसे में इनका लोकतांत्रिक प्रक्रिया में शामिल होना एक बड़ा बदलाव माना जा रहा है।

मुख्यमंत्री से मुलाकात के मायने

मुख्यमंत्री रेवंत रेड्डी से मुलाकात को राजनीतिक विश्लेषक कई नजरिए से देख रहे हैं। एक ओर इसे राज्य सरकार की पुनर्वास और मुख्यधारा में शामिल करने की नीति की सफलता के रूप में देखा जा रहा है, वहीं दूसरी ओर विपक्षी दल इस कदम पर सवाल भी उठा सकते हैं।

बैठक के दौरान पुनर्वास, सुरक्षा, सामाजिक पुनर्स्थापन और भविष्य की भूमिका जैसे विषयों पर चर्चा होने की जानकारी सामने आई है। हालांकि आधिकारिक बयान में चुनाव लड़ने के मुद्दे पर स्पष्ट टिप्पणी नहीं की गई है।

जनता और दलों के सामने चुनौती

अब सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या राजनीतिक दल इन नेताओं को टिकट देने का जोखिम उठाएंगे? और यदि टिकट मिलता है, तो क्या जनता उनके अतीत को दरकिनार कर उन्हें अपना प्रतिनिधि चुनेगी?

विशेषज्ञों का मानना है कि नक्सल प्रभावित क्षेत्रों में यदि पूर्व उग्रवादी लोकतांत्रिक प्रक्रिया में सक्रिय रूप से भाग लेते हैं, तो यह शांति स्थापना की दिशा में सकारात्मक संकेत हो सकता है। लेकिन उनके रक्तरंजित अतीत को लेकर नैतिक और राजनीतिक बहस भी तेज होना तय है।

आने वाले विधानसभा चुनाव में यह देखना दिलचस्प होगा कि दहशत के साये से निकलकर लोकतंत्र के मंच पर आए ये चेहरे कितना जनसमर्थन जुटा पाते हैं।

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