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विश्व प्लंबिंग दिवस: शहरों को जिंदा रखने वाले उस गुमनाम हीरो को सलाम

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संवाददाता – हारून रशीद

दुनिया का सबसे अनदेखा हीरो

11 मार्च
आज विश्व प्लंबिंग दिवस है।

अख़बारों में शायद छोटी-सी खबर होगी।
सोशल मीडिया पर शायद ही किसी ने पोस्ट डाली हो।

क्योंकि यह दिन
न किसी अभिनेता का है,
न किसी नेता का,
न किसी अरबपति का।

यह दिन उस इंसान का है
जिसे समाज अक्सर “मज़दूर” कहकर भूल जाता है।

लेकिन ज़रा ठहरिए…

अगर एक दिन
पानी की पाइपें जवाब दे दें,
सीवर का रास्ता बंद हो जाए,
और नल सिर्फ हवा उगलने लगें —

तो शहर की सबसे ऊँची इमारत भी
कुछ ही घंटों में सभ्यता से कूड़ाघर बन सकती है।

सच यह है कि
इंसान ने चाँद पर झंडा लगा दिया,
आसमान में सैटेलाइट टांग दिए,
मोबाइल में पूरी दुनिया भर ली।

लेकिन अगर
पानी का रास्ता और गंदगी का निकास
ठीक न हो —

तो पूरी तरक्की
सिर्फ बदबू में बदल जाती है।

सभ्यता की असली रीढ़
ना संसद है,
ना शेयर बाजार,
ना सिलिकॉन वैली।

सभ्यता की असली रीढ़ है —
वो अदृश्य पाइपलाइन
जो चुपचाप शहरों को जिंदा रखती है।

और उस पाइपलाइन का असली रखवाला
वो इंसान है
जो अक्सर गली के मोड़ पर
रिंच और पाइप लेकर बैठा होता है।

अजीब विडंबना है।

जब सब कुछ ठीक चलता है
तो कोई उसे याद नहीं करता।

लेकिन जब
नल सूख जाए
या नाली उफनने लगे —

तब पूरी दुनिया
उसी को फोन करती है।

तीसरी आंख का सच

सभ्यता का असली स्तर
इससे नहीं मापा जाएगा
कि शहर में कितनी ऊँची इमारतें हैं।

बल्कि इससे मापा जाएगा
कि उन इमारतों के नीचे
पानी और गंदगी का रास्ता कितना ईमानदार है।

और उस रास्ते का असली वास्तुकार
कोई अरबपति नहीं —

एक प्लंबर है।

दुनिया चाँद तक पहुँचने पर गर्व करती है…
लेकिन सच यह है कि इंसानियत आज भी पाइपलाइन के भरोसे जिंदा है।

(यह सिर्फ एक प्लंबिंग की समस्या नहीं है, यह उस इंसान के श्रम और गरिमा की झलक है, जिसके बिना हमारी आज की आधुनिक जीवनशैली कुछ ही घंटों में ठप हो जाएगी।)

नोट:
“यह तस्वीर उस मेहनत को सलाम है,
जिसके बिना हमारी आधुनिक जिंदगी कुछ ही घंटों में ठहर जाएगी।”

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