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जब मांदर की थाप पर गूंजती है आस्था: माँ करमा देवी और करमा पर्व की सदियों पुरानी परंपरा

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भारत की लोकसंस्कृति में कई ऐसी देवियाँ हैं जिनकी पूजा केवल मंदिरों में ही नहीं, बल्कि जनजीवन, खेत-खलिहान और जंगलों के बीच होती है। ऐसी ही एक लोकआस्था की देवी हैं माँ करमा देवी, जिन्हें कर्म, प्रकृति और समृद्धि की प्रतीक माना जाता है।

विशेष रूप से छत्तीसगढ़, झारखंड, ओडिशा और मध्य भारत के आदिवासी और ग्रामीण समाज में माँ करमा देवी की गहरी श्रद्धा है। उनके सम्मान में हर वर्ष करमा पर्व बड़े उत्साह के साथ मनाया जाता है।

लोकजीवन से जुड़ी देवी

माँ करमा देवी केवल धार्मिक आस्था की प्रतीक नहीं हैं, बल्कि कर्म, श्रम और सामूहिकता के संदेश की भी प्रतीक मानी जाती हैं।

लोककथाओं के अनुसार, जो व्यक्ति मेहनत और ईमानदारी से अपना कर्म करता है, उस पर माँ करमा देवी की विशेष कृपा होती है।

ग्रामीण समाज में यह मान्यता है कि माँ करमा देवी की पूजा से

  • परिवार में सुख-समृद्धि आती है
  • खेतों में अच्छी फसल होती है
  • समाज में आपसी एकता बनी रहती है

करमा पर्व और परंपरा

करमा पर्व के दिन गाँव के लोग करम वृक्ष की डाली लाकर उसकी पूजा करते हैं। ढोल-मांदर की थाप पर युवक-युवतियाँ करमा नृत्य करते हैं। यह केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं बल्कि सामुदायिक उत्सव और प्रकृति के प्रति सम्मान का प्रतीक है।

रात भर गीत-नृत्य चलता है और माँ करमा देवी से प्रार्थना की जाती है कि
समाज में सुख-शांति और समृद्धि बनी रहे।

प्रकृति और संस्कृति का संदेश

माँ करमा देवी की परंपरा हमें यह भी सिखाती है कि
मनुष्य और प्रकृति का संबंध अटूट है।

पेड़-पौधों, जंगलों और धरती के प्रति सम्मान ही जीवन की समृद्धि का आधार है। इसलिए करमा पर्व केवल पूजा नहीं, बल्कि प्रकृति संरक्षण और सामूहिक जीवन मूल्यों का भी संदेश देता है।

 

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