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एलपीजी संकट से जूझ रहा ऑटो कंपोनेंट उद्योग, मजदूरों के पलायन से उत्पादन पर खतरा

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ऑटो कंपोनेंट बनाने वाली कंपनियां एलपीजी सिलेंडर की कमी के कारण अपने मजदूरों के गांव लौटने की समस्या का सामना कर रही हैं। इससे उत्पादन पर असर पड़ सकता है। एसीएमए ने सोमवार को कहा कि ये स्थिति कोविड महामारी जितनी मुश्किल तो नहीं है, लेकिन अगर इसे जल्द हल नहीं किया गया, तो ये और खराब हो सकती है। भारतीय वाहन कलपुर्जा विनिर्माता संघ (ACMA) 1,064 से ज्यादा कंपनियों का प्रतिनिधित्व करता है। ये विनिर्माता संगठित क्षेत्र में ऑटो कंपोनेंट इंडस्ट्री के कुल कारोबार में 90 प्रतिशत से ज्यादा का योगदान देते हैं।

एसीएमए के महानिदेशक, विन्नी मेहता ने बताया, ”मजदूर खाना पकाने के लिए छोटे गैस बर्नर का इस्तेमाल करने लगे थे, क्योंकि वायु प्रदूषण के कारण लकड़ी जलाने को हतोत्साहित किया जा रहा था। अब, एलपीजी सिलेंडर की कमी के कारण उन्हें घर पर खाना बनाना मुश्किल हो रहा है। साथ ही, कुछ फैक्ट्रियों की कैंटीन भी बंद हैं, जिसके चलते उन्हें अपने गांव लौटने पर मजबूर होना पड़ रहा है।” वित्त वर्ष 2024-25 में ऑटो कंपोनेंट इंडस्ट्री का कुल कारोबार 80.2 अरब डॉलर रहा था। इसमें 22.9 अरब डॉलर का निर्यात और 50 करोड़ डॉलर का व्यापार अधिशेष शामिल है। ईरान पर अमेरिका-इजरायल युद्ध के कारण गैस आपूर्ति में रुकावटें आई हैं।

सरकार घरेलू उपभोक्ताओं पर ज्यादा ध्यान दे रही है, जिससे इंडस्ट्री को कमर्शियल एलपीजी नहीं मिल पा रही है। इस समस्या को देखते हुए पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस मंत्रालय ने 9 मार्च को एक समिति का गठन किया, जो उद्योग की शिकायतों और सुझावों पर विचार करेगी। पश्चिम एशिया संकट के कारण सरकार ने घरेलू स्तर पर उत्पादित प्राकृतिक गैस के आवंटन की प्राथमिकता सूची में बदलाव किया है।

पिछले हफ्ते भारी उद्योग मंत्रालय को लिखे एक पत्र में, एसीएमए ने कहा था कि ये उद्योग वैश्विक वाहन मूल्य श्रृंखलाओं के साथ गहराई से जुड़ा हुआ है। मौजूदा भू-राजनीतिक उथल-पुथल के दौर में अगर समय पर सहायता मिलती है, तो इससे निर्यात की निरंतरता बनी रहेगी और अंतरराष्ट्रीय बाज़ारों में भारत की प्रतिस्पर्धात्मकता भी सुरक्षित रहेगी।

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