चैत्र नवरात्रि हिंदू धर्म का एक पवित्र पर्व है, जो शक्ति की उपासना के लिए समर्पित होता है। इस नौ दिनों के उत्सव की शुरुआत प्रथम दिन माँ शैलपुत्री की पूजा से होती है। यह दिन विशेष रूप से भक्तों के लिए नई ऊर्जा, आस्था और शुद्धता का प्रतीक माना जाता है।
माँ शैलपुत्री कौन हैं?
माँ शैलपुत्री को देवी दुर्गा का पहला स्वरूप माना जाता है। “शैल” का अर्थ पर्वत होता है और “पुत्री” का अर्थ बेटी, इसलिए इन्हें पर्वतराज हिमालय की पुत्री कहा जाता है। पूर्व जन्म में ये सती के रूप में भगवान शिव की पत्नी थीं।
माँ शैलपुत्री का स्वरूप
माँ शैलपुत्री का वाहन वृषभ (बैल) है, इसलिए इन्हें वृषारूढ़ा भी कहा जाता है। इनके दाहिने हाथ में त्रिशूल और बाएं हाथ में कमल का फूल होता है। इनका स्वरूप सरल, शांत और दिव्य ऊर्जा से भरपूर होता है।
पूजा का महत्व
नवरात्रि के पहले दिन माँ शैलपुत्री की पूजा करने से जीवन में स्थिरता, शक्ति और साहस प्राप्त होता है। यह दिन मूलाधार चक्र से जुड़ा होता है, जिससे व्यक्ति की आध्यात्मिक यात्रा की शुरुआत होती है।
पूजा विधि
- प्रातः स्नान कर स्वच्छ वस्त्र धारण करें
- पूजा स्थल पर माँ शैलपुत्री की प्रतिमा या चित्र स्थापित करें
- घी का दीपक जलाएं
- मां को सफेद फूल और भोग अर्पित करें
- दुर्गा चालीसा और मंत्रों का पाठ करें
भोग और रंग
इस दिन माँ को शुद्ध घी का भोग लगाया जाता है, जिससे शरीर स्वस्थ रहता है और रोग दूर होते हैं।
पहले दिन का शुभ रंग सफेद माना जाता है, जो शांति और पवित्रता का प्रतीक है।







