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विश्व गौरैया दिवस: हाई स्कूल हात्मा के बच्चों ने बनाए कृत्रिम घोंसले, नन्हीं गौरैया को बचाने की अनूठी पहल

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विनीत पिल्लई –

आज ‘विश्व गौरैया दिवस’ के अवसर पर हाई स्कूल हात्मा के स्कूली बच्चों ने पर्यावरण संरक्षण और विलुप्त हो रही नन्हीं गौरैया को बचाने के लिए एक बेहद सराहनीय पहल की। स्कूल में आज एक विशेष जागरूकता कार्यक्रम का आयोजन किया गया, जहां बच्चों ने अपने हाथों से गौरैया के लिए सुंदर और सुरक्षित घोंसले बनाए।

​बच्चों में दिखा भारी उत्साह
बढ़ते शहरीकरण, कंक्रीट के जंगलों और पेड़ों की कटाई के कारण हमारे आंगनों में चहचहाने वाली गौरैया की संख्या में तेजी से कमी आई है। इसी बात को ध्यान में रखते हुए शिक्षकों ने बच्चों को गौरैया के संरक्षण के प्रति जागरूक किया। इसके बाद बच्चों ने गत्ते (कार्डबोर्ड), लकड़ी के छोटे टुकड़ों, और अन्य इको-फ्रेंडली चीजों का इस्तेमाल करके बेहद कलात्मक घोंसले तैयार किए। इस रचनात्मक कार्य के दौरान बच्चों का उत्साह देखते ही बन रहा था।

​घरों में लगाए गए घोंसले, दाना-पानी रखने का लिया संकल्प
स्कूल में घोंसले बनाने के बाद, सभी बच्चे उन्हें बड़े चाव से अपने-अपने घर ले गए। बच्चों ने इन घोंसलों को अपने घरों की बालकनी, छतों, पेड़ों और आंगनों में सुरक्षित स्थानों पर लगाया। इसके साथ ही, बच्चों ने यह संकल्प भी लिया कि वे नियमित रूप से इन घोंसलों के पास गौरैया के लिए दाना और पानी रखेंगे, ताकि इन नन्हें पक्षियों को गर्मी के मौसम में राहत मिल सके और वे वापस हमारे घरों के आस-पास अपना बसेरा बना सकें।

​व्याख्याता संदीप सेन का खास संदेश
इस अवसर पर हाई स्कूल हात्मा के व्याख्याता श्री संदीप सेन ने बच्चों की सराहना करते हुए समाज को एक महत्वपूर्ण संदेश दिया। उन्होंने कहा, “गौरैया हमारे पर्यावरण और पारिस्थितिकी तंत्र का एक अहम हिस्सा है। आधुनिक जीवनशैली के कारण ये प्यारे पक्षी हमसे दूर होते जा रहे हैं। आज हमारे स्कूल के बच्चों ने जो घोंसले बनाए हैं, वे सिर्फ लकड़ी या गत्ते के ढांचे नहीं हैं, बल्कि यह प्रकृति के प्रति उनकी गहरी संवेदनशीलता और प्रेम का प्रतीक है। हम सभी नागरिकों का यह कर्तव्य है कि हम अपने घरों के आस-पास गौरैया के लिए दाना-पानी रखें और पर्यावरण को फिर से उनके अनुकूल बनाएं।”

पर्यावरण के लिए एक सकारात्मक कदम
स्कूल प्रबंधन, अन्य शिक्षकों और अभिभावकों ने बच्चों की इस पहल की भरपूर सराहना की है। पर्यावरण प्रेमियों का भी मानना है कि नई पीढ़ी में पक्षियों और प्रकृति के प्रति यह संवेदनशीलता भविष्य में पर्यावरण संतुलन बनाए रखने में बहुत मददगार साबित होगी।

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