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मैं अकेली हूं सबसे भारी हूं मैं नारी हूं मैं नारी हूं … डॉ रवींद्रनाथ सरकार

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रायपुर संवाददाता लक्ष्मी नारायण लहरे

“संकेत साहित्य समिति की काव्य गोष्ठी “

रायपुर । रायपुर संकेत साहित्य समिति द्वारा वृंदावन हॉल रायपुर में विगत दिवस भाषाविद् एवं वरिष्ठ साहित्यकार डॉ. चितरंजन कर के मुख्य आतिथ्य , लब्धप्रतिष्ठ व्यंग्यकार गिरीश पंकज की
अध्यक्षता एवं के.पी.सक्सेना ‘दूसरे’, शकुंतला तरार तथा नीलू मेघ के विशिष्ट आतिथ्य में होली , गौरैया दिवस व नारी सशक्तिकरण पर केन्द्रित सरस काव्य गोष्ठी का आयोजन किया गया। कार्यक्रम के आरंभ में माँ सरस्वती की पूजा अर्चना के पश्चात समिति द्वारा अतिथियों का अंगवस्त्र, मोतियों की माला एवं श्रीफल से सम्मान किया गया। संकेत साहित्य समिति के संस्थापक एवं प्रांतीय अध्यक्ष डॉ माणिक विश्वकर्मा ‘नवरंग’ ने स्वागत उद्बोधन में संमिति की दीर्घकालीन साहित्यिक यात्रा पर प्रकाश डालते हुए कहा कि साहित्य समाज का प्रतिबिंब होता है जिसे साहित्यकार शब्दों के माध्यम से चित्रित करता है। डॉ.चितरंजन कर ने कहा कि सुनाने वाले के भीतर सुनने का भी माद्दा होना चाहिए । सुनने और गुनने से प्रतिभा में निखार आता है। गिरीश पंकज ने कहा कि काव्य गोष्ठियाँ कार्यशाला होती हैं सृजनकर्ताओं के लिए। इसमें शामिल होने से नये सृजन को बल मिलता है। सुपरिचित कवयित्री पल्लवी झा के सफल संचालन में पचास से अधिक जिन कवियों एवं कवयित्रियों ने काव्य पाठ किया उनमें – डॉ.चितरंजन कर , गिरीश पंकज , डॉ. माणिक विश्वकर्मा ‘नवरंग’, के.पी. सक्सेना ‘दूसरे, नीलू मेघ, शकुंतला तरार, डॉ.सिद्धार्थ कुमार श्रीवास्तव, पल्लवी झा, सुषमा पटेल, पूर्वा श्रीवास्तव, गोपाल जी सोलंकी, छबि लाल सोनी, डॉ.रविन्द्र सरकार, हरीश कोटक, माधुरी कर, रीना अधिकारी, दिलीप वरवंडकर, शिवशंकर गुप्ता,मन्नु लाल यदु , लवकुश तिवारी, यशवंत यदु , देवाशीष अधिकारी, चेतन भारती, राजकुमार सोनी, रामचंद्र श्रीवास्तव, विवेक रहाटगाँवकर , कुमार जगदली, अंबर शुक्ला ‘अंबरीश’, राजेन्द्र ओझा, डॉ.गोपा शर्मा, डॉ. मृणालिका ओझा, अनीता झा,राकेश अग्रवाल, नीलिमा मिश्रा, कल्याणी तिवारी ‘कोकी’, गणेश दत्त झा, बीबीपी मोदी, डॉ.एन.पी.यादव, लतिका भावे, मुरलीधर गोंडाने, रूनाली चक्रवर्ती, नर्मदा प्रसाद विश्वकर्मा, सीमा पांडे, रामचंद्र श्रीवास्तव, आर.सी.राम, नीलिमा मिश्रा, भारती यादव मेधा, नितेश ठाकुर, योगेश शर्मा ‘योगी’, बलजीत कौर,एकता शर्मा, श्रद्धा पाठक,शिवशंकर गुप्ता एवं महेश गुप्ता के न नाम प्रमुख हैं। होली नारी सशक्तिकरण ,गौरैया दिवस एवं सामयिक परिवेश पर केन्द्रित नयी चेतना, नयी परिकल्पना एवं नयी विचारधाराओं से संबंधित पढ़ी गईं कुछ रचनाओं के प्रमुख अंश निम्नानुसार हैं-
● सीता राधा दुर्गा लक्ष्मी,शारद माई गुण के खान। नार बिलासा सावित्री ले,बाढ़िस सब नारी के मान।।
नारी धीरज बीज रोप के,देवत हे सुग्घर संस्कार। नारी चंदा ला छू डारिस,देखत रहिगे ये संसार।।
-पल्लवी झा ‘रूमा’
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● मैं अपनी ख़ुशी के लिए जीती हूँ
ख़ुशियों का मंज़िल संवारना जानती हूँ
आज़ादी की मंज़िल बनाना जानती हूँ
अनिता शरद झा
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● मैं अकेली हूँ फिर भी सबसे भारी हूँ ,
मैं नारी हूँ ,मैं नारी हूँ।
-डॉ रविंद्रनाथ सरकार
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● आँगन में है नाचती, गौरैया है नाम।
दाना-पानी डालना, सुंदर है यह काम।।
-सुषमा प्रेम पटेल
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● आज विश्व के सभी धर्म में है नारी का सम्मान।
सहनशीलता के गुण का मिला इसे वरदान।
-शिवशंकर गुप्ता, रायपुर
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● मां ,क्या इसी दुनिया को दिखाने के लिए किया था तुमने / जीवन और मृत्यु का संघर्ष / जहां पैदा होने से पहले ही,भावी मां को/ मौत की नींद ,सुला दिया जाता है
-रीना अधिकारी
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● हे माँ मेरा तुझे तुझे कोटि कोटि प्रणाम।
अजन्म से ही वात्सल्य -सिंचित कर दिया धाम ।।
-डॉ.सिद्धार्थ कुमार श्रीवास्तव
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● क़लम कितनी भी मँहगी हो सकती है ,
पर शब्द से अधिक कीमती कतई नहीं ।
चाहे क़लम की तुलना शमशीर से कर लें,
पर शब्द घाव भी है ,मरहम भी।
-हरीश कोटक
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रंग-रंग- रंग- रंग / कान्हा दियो ऐसो रंग /
सांवरे का रंग चढ़ा / राधा- रानी भीगा अंग।
लाल पिला हरा नीला / रंगे है छैल छबीला ,
माने न वो हरजाई
-श्रद्धा पाठक ‘ स्वस्ति ‘
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● मैं सरस्वती का ज्ञान पुंज, मैं लक्ष्मी का वरदान हूँ,
सुंदर इस नूतन युग में, संकल्पों की ऊंची उड़ान हूँ।
-​भारती यादव ‘मेधा’, रायपुर
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● रंग लगाकर गुलाल मल गालों पर
प्यारे मोहन से निश्चल प्यार करेंगे /कब आओगे मोरे कान्हा फिर कब लाओगे पिचकारी में रंग भरकर ।
-बीबीपी मोदी
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● माँ वो जादूगर है
जो पानी पिलाकर
भूख मिटा देती है।
दिलीप वरवंडकर
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● बस नारा उछालने का काम रह गया है हुक्मरानों का, बेटी बचावो-बेटी पढ़ाओ बना जुमला इश्तेहार का।
-कुमार जगदली
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● सारे घर की रौनकें बहार बढ़ाती ये बेटियां, हिंदू की दिवाली मुस्लिम की ईद में मुस्काती ये बेटियां।।
-सुमन शर्मा बाजपेयी
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● नवयुग की नवचेतना प्रवाहिनी हो तुम,
अपने अधिकार की दीप्तियुक्ता नारी हो तुम। अब पराधीन नहीं स्वनिर्मित व्यक्तित्व की उद्घोषिका हो तुम।
-श्रीमती कल्याणी तिवारी “कोकि”
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● मत भूलो उस शक्ति को, जो घर की नींव कहलाती है।
वो ‘ग्रहणी’ मौन रह के,
पूरे घर को महकाती है॥
-लवकुश तिवारी
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● नारी पत्नी ,बहू, बेटी और माता है,नारी जग जननी है भाग्यविधाता है।
धैर्य, साहस और शक्ति का है अद्भुत संगम,
घर परिवार की खातिर तत्पर रहती है हरदम।
-राजकुमार सोनी
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● आ गया ऋतुराज धरती, लें सुमन भर डालियांँ /अश्वत्थ तरु पत्ते बजाते , जोर से सब तालियाँ।।
-नर्मदा प्रसाद विश्वकर्मा “तृण”
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● यह कोमल कवि हृदय भी है गर छेड़ोगे चिंगारी है l
नेह मिले तो शीश नवा दे, दुष्टों पर तेज कटारी है l
-पूर्वा श्रीवास्तव
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● कुछ नहीं करता /बस शब्दों से / तुझे गढ़ने की कोशिश / करता हूँ/
जाने कैसे कविता बन जाती है
-राकेश अग्रवाल ‘साफ़िर’
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● शादी का चुकाना पड़ेगा दाम पति जी।
मैं “अर्चना” और तुम हो मेरे “राम” पति जी।
बरतन भी सिंक में भरे, कपड़े अलग पड़े।
धो लो कि बहुत हो गया आराम पति जी।
-रामचन्द्र श्रीवास्तव
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● नारी से नर शोभित हैं /सुन ले ये सकल जहान ।
नारी बिना अपूर्ण सभी सब जीव जगत भगवान ।
-छबि लाल सोनी
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● ईद की खुशी क्या होती हैं दोस्त जान जाओगे / जब हामिद की तरह तुम भी / चिमटा खरीद कर लाओगे/ मैं भी ईद में ईदी लेकर आया हूँ/ अम्मी तेरे हाथ ना जले, चिमटा खरीद लाया हूँ।।
-यशवंत यदु
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● सीखना है उड़ना तो / फुदको तुम
रेंगने और / गिरते, सम्हलते /चलते हुए लड़खड़ाने के बाद /यह फुदकना ही है /
जो उड़ने के करीब है।
-राजेंद्र ओझा
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● टुटहा छानी तरी बिराजे,
भगवती से मिलावत हंव।
छत्तीसगढ़हिन डोकरी दाई के किस्सा ल सुनावत हंव।। डॉ मृणालिका ओझा।
डॉ.मृणालिका ओझा
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● दुनिया से जाने वालो
एक काम किजिए।
जाते जाते अपने नयन
दान किजिए।
-मुरलीधर गोंडाने नीर
बिलासपुर।
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● नर बड़ा या बड़ी है नारी,
इस बहस में आज पड़ी है दुनिया सारी ।
-विवेक कुमार रहाटगांवकर
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● माथे पर चिंता रूपी /पसीने की बूंदों के नन्हे नन्हे से कण/मिटटी में गिरता देख/
अपार सुख की अनुभूति से सराबोर/नए घर में रहने के सुख का /सपना संजोती/
बस्तर की नारी
-शकुंतला तरार
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● युद्ध की विभीषिका / लील जाएगी सारा कुछ/ मचेगा त्राहिमाम् / नही बचेगा कोई। न युद्ध थोपने वाले / और न ही युद्ध झेलने वाले।
-नीलू मेघ “नीलम”
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● तन पांचो में बट गया बटा न मन का भाग।
हर युग रोई द्रौपदी भले अलग थे राग।।
-के.पी.सक्सेना ‘दूसरे’
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● कविता का मतलब नहीं ,शब्दों की भरमार । कुछ तो उसका मर्म हो कुछ तो हो आधार।। फैल गया है इनदिनों ,जगह जगह ये रोग। सम्मानित होने लगे, दो कौड़ी के लोग ।।
-डॉ.माणिक विश्वकर्मा ‘नवरंग’
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● मेरा रिश्ता गौरैया से / मेरे घर में उसका घर है / मेरे कमरे के कोने में / उसका घर मेरे ऊपर है
-डॉ. चितरंजन कर
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● आँगन में तू आ गौरैया / फिर से गाना गा गौरैया/ आ ना, तेरे लिये रखा है / पानी औ दाना गौरैया / बिन तेरे जीवन ये कैसा/ सबको ये समझा गौरैया
-गिरीश पंकज
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कार्यक्रम के अंत में कार्यक्रम संयोजक रामकुमार सोनी ने आमंत्रित अतिथियों एवं रचनाकारों के प्रति संकेत साहित्य समिति की ओर से आभार व्यक्त किया।

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