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इस ‘चाय वाले’ पर गुस्सा क्यों, देश चला रहे चाय वाले पर बिफरो न

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बस्तर संवाददाता – अर्जुन झा

गैस की किल्लत का जगदलपुर में असर
बढ़ा दी गईं चाय और नाश्ते की कीमतें 

जगदलपुर। ईरान- इजरायल युद्ध का असर अब बस्तर तक पहुंच गया। युद्ध का असर दिखने लगा है। कुकिंग गैस की किल्लत सेजहां हर घर की रसोई में वीरानी का आलम है, वहीं चाय नाश्ते की गुमटियों, होटलों और रेस्टोरेंट में गैस सिलेंडर के अभाव का प्रतिकूल प्रभाव साफ नजर आने लगा है। एलपीजी सिलेंडर्स की कालाबाजारी जगदलपुर में शुरू हो गई है।

गैस की किल्लत के चलते चाय पीने वालों और बेचने वालों दोनों को अब ज्यादा कीमत चुकानी पड़ रही है। चाय की प्याली की रेट बढ़ा दी गई है। होटल संचालकों को ज्यादा कीमत चुका कर सिलेंडर की व्यवस्था करनी पड़ रही है। आज जगदलपुर के टी ग्रुप में यही चर्चा का विषय रहा कि गैस की किल्लत के चलते शहर के मशहूर साहू चाय वाले ने अपनी दुकान बंद कर दी है। वहीं अन्य लोगों ने चाय की कीमत 15 रुपए प्रति कप कर दी है। शहर के कुछ प्रमुख चाय बेचने की टपरियों, पुराना बस स्टैंड, सीरासार चौक, शहीद पार्क पर लगने वाले ठेले खोमचों में सुबह सुबह चाय की चुस्की लगाने अधिकारी, कर्मचारी, नेता, पत्रकार, व्यवसायी सब इकट्ठे होते हैं। आज सभी लोग चाय की बढ़ी कीमत पर गुस्सा निकालते नजर आए। लोग कह रहे थे दो देशों की लड़ाई की आग में आखिर हमें क्यों जलाया जा रहा है। कुछ लोग तो चाय वालों पर गुस्सा उतारते दिखे। इस दौरान विपक्ष के एक नेता को मौका मिल गया। इस नेताजी ने तपाक से कहा- इस बेचारे गरीब चाय वाले पर आप क्यों नाराज हो हो रहे हैं? गुस्सा निकालना है तो अपने चाय वाले प्रधानमंत्री पर निकालो।

लौट आए लकड़ी-कंडों के दिन
बहरहाल गैस की कमी से अब जनजीवन प्रभावित होने लगा। पुराने जमाने का दौर फिर शुरू हो गया है।होटलों और रेस्टोरेंट में कोयला एवं लकड़ियों की भट्ठियां जलने लगी हैं। इसी तरह प्रायः हर रसोई घर में भी ऐसे ही हालात हैं। रिफिल सिलेंडर की डिलीवरी नहीं हो रही। सिंगल सिलेंडर और डीबीसी यानि डबल बैरल कनेक्शन वाले लोगों ने भी सम्हल सम्हल कर रसोई गैस का इस्तेमाल करना शुरू कर दिया है। ज्यादातर घरों में गोबर के उपलों कंडों और लकड़ियों का उपयोग किया जाने लगा है। मिट्टी से बने चूल्हों के साथ ही पुरातन ईंधन लकड़ी कंडों के दिन लौट आए हैं। के दिन लौट आए हैं। लोग गैस एजेंसियों में तो लाइन लगा रहे हैं, कंडे और जलाऊ लकड़ियां बेचने वालों के घरों तथा आरा मशीनों में भी पहुंचने लगे हैं।

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