जांजगीर चांपा संवाददाता – राजेन्द्र जायसवाल
“ट्रिपल इंजन सरकार” के दावों के बीच जमीनी हकीकत: कर्मचारियों के घरों में बुझ रहा चूल्हा
जिला जांजगीर-चांपा — विकास, सुशासन और पारदर्शिता के बड़े-बड़े दावे करने वाली सरकार के बीच चांपा नगर पालिका परिषद की जमीनी हकीकत बेहद चिंताजनक और मानवीय संवेदनाओं को झकझोर देने वाली है। यहां कार्यरत सैकड़ों प्लेसमेंट कर्मचारी पिछले तीन माह से अपने वेतन के लिए तरस रहे हैं, जिससे उनके सामने भूख, कर्ज और परिवार चलाने का संकट खड़ा हो गया है।
यह केवल एक प्रशासनिक चूक नहीं, बल्कि उन श्रमिकों के साथ सीधा अन्याय और शोषण है, जो शहर को स्वच्छ, सुरक्षित और व्यवस्थित रखने में अपनी अहम भूमिका निभाते हैं।
नगर पालिका का सिस्टम फेल — मजदूरों की जिंदगी संकट में
चांपा नगर पालिका परिषद के अंतर्गत कार्यरत प्लेसमेंट कर्मचारी — जिनमें सफाई कर्मी, चौकीदार, गार्डन में काम करने वाले मजदूर और अन्य श्रमिक शामिल हैं — पिछले तीन महीने से वेतन के लिए भटक रहे हैं।
इन कर्मचारियों का कहना है कि:
जनवरी, फरवरी और मार्च का वेतन अब तक नहीं मिला
बार-बार शिकायत करने के बावजूद केवल आश्वासन ही दिया गया
घर का खर्च चलाना मुश्किल हो गया है
कई कर्मचारियों को उधार लेना पड़ रहा है
एक कर्मचारी ने बताया:
“हम रोज काम करते हैं, शहर को साफ रखते हैं, लेकिन जब घर जाते हैं तो बच्चों के लिए खाना तक नहीं होता। आखिर हम जाएं तो जाएं कहां?”
परिवारों पर पड़ रहा गहरा असर
वेतन न मिलने का असर सिर्फ कर्मचारियों तक सीमित नहीं है, बल्कि उनके पूरे परिवार को इसकी कीमत चुकानी पड़ रही है।
बच्चों की पढ़ाई प्रभावित हो रही है
राशन खरीदने के लिए पैसे नहीं
दवा और इलाज की समस्या
मकान किराया तक देना मुश्किल
कुछ कर्मचारियों ने यह भी बताया कि उनके घरों में भूखे रहने की नौबत आ गई है।
यह स्थिति साफ दर्शाती है कि यह केवल आर्थिक संकट नहीं बल्कि मानवीय संकट बन चुका है।
सीएमओ से शिकायत — लेकिन सिर्फ आश्वासन
कर्मचारियों ने अपनी समस्या को लेकर नगर पालिका के सीएमओ रामसंजीवन सोनवानी से कई बार मुलाकात की, लेकिन हर बार उन्हें सिर्फ आश्वासन देकर वापस भेज दिया गया।
यह सवाल उठता है कि:
आखिर वेतन भुगतान में देरी क्यों हो रही है?
क्या फंड की कमी है या प्रशासनिक लापरवाही?
यदि समस्या है तो उसका समाधान क्यों नहीं किया जा रहा?
ट्रिपल इंजन सरकार के दावे बनाम हकीकत
सरकार द्वारा “ट्रिपल इंजन” (केंद्र, राज्य और स्थानीय निकाय) की मजबूती का दावा किया जाता है, लेकिन चांपा नगर पालिका की स्थिति इन दावों की पोल खोलती नजर आ रही है।
अगर तीन स्तर की सरकार होने के बावजूद कर्मचारियों को तीन महीने तक वेतन नहीं मिलता, तो यह सीधे-सीधे प्रशासनिक विफलता को दर्शाता है।
प्रणालीगत खामियां — आखिर जिम्मेदार कौन?
इस पूरे मामले में कई सवाल खड़े होते हैं:
क्या प्लेसमेंट एजेंसी समय पर भुगतान नहीं कर रही?
क्या नगर पालिका द्वारा फंड जारी नहीं किया गया?
क्या कर्मचारियों के अधिकारों की अनदेखी की जा रही है?
यदि किसी भी स्तर पर लापरवाही हुई है, तो उसकी जवाबदेही तय होना बेहद जरूरी है।
*कानूनी और नैतिक सवाल
भारत के श्रम कानूनों के* अनुसार:
कर्मचारियों को समय पर वेतन देना अनिवार्य है
वेतन रोकना श्रम कानून का उल्लंघन है
यह मानवाधिकारों के खिलाफ भी है
ऐसे में यह मामला केवल प्रशासनिक नहीं, बल्कि कानूनी कार्रवाई योग्य भी बनता है।
जनता और जनप्रतिनिधियों की चुप्पी भी सवालों के घेरे में
इस गंभीर मुद्दे पर न तो कोई बड़ा जनप्रतिनिधि खुलकर सामने आया है और न ही किसी स्तर पर ठोस पहल दिख रही है।
क्या स्थानीय जनप्रतिनिधि इस समस्या से अनजान हैं?
या फिर जानबूझकर चुप्पी साधी गई है?
अब नहीं तो कब? — प्रशासन से सीधी मांग
चांपा नगर पालिका के कर्मचारियों की इस गंभीर समस्या को देखते हुए प्रशासन से निम्न मांगें की जाती हैं:
तत्काल वेतन भुगतान
तीन माह का बकाया वेतन तत्काल जारी किया जाए।
जिम्मेदारों पर कार्रवाई
वेतन रोकने के लिए जिम्मेदार अधिकारियों/एजेंसी के खिलाफ सख्त कार्रवाई हो।
नियमित भुगतान व्यवस्था
भविष्य में ऐसी स्थिति न हो, इसके लिए ठोस व्यवस्था बनाई जाए।
श्रमिकों के अधिकारों की सुरक्षा
प्लेसमेंट कर्मचारियों के अधिकारों की रक्षा सुनिश्चित की जाए।
चांपा नगर पालिका को संघर्ष की चेतावनी
यदि जल्द ही इस समस्या का समाधान नहीं किया गया, तो कर्मचारी आंदोलन का रास्ता अपनाने को मजबूर हो सकते हैं।
धरना प्रदर्शन काम बंद
जैसी स्थितियां उत्पन्न हो सकती है…







