Home चर्चा में कुसुम की खेती किसानों के लिए बनी फायदेमंद

कुसुम की खेती किसानों के लिए बनी फायदेमंद

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संवादाता डुगेश्वर संजू साहू
बलौदाबाजार,। कलेक्टर कुलदीप शर्मा के निर्देश पर कृषि विभाग द्वारा जिले के किसानों को ग्रीष्मकालीन धान के बदले कम पानी में अधिक लाभ देने वाली फसल कुसुम की खेती अपनाने हेतु प्रेरित किया जा रहा है। इसी कड़ी में जिले के किसानों के लिये कुसुम क़ी खेती अधिक लाभ क़ी खेती बन गई है।
राज्य स्तरीय डॉ. खुबचंद बघेल कृषक रत्न से सम्मानित विकासखण्ड पलारी के ग्राम मुसुवाडीह के कृषक वामन टिकरिहा द्वारा 10 एकड़ रकबे में कुसुम की खेती किया जा रहा है। कृषक के द्वारा विगत वर्ष ग्रीष्मकालीन धान की खेती की गई थी, परन्तु गिरते भूजल स्तर के कारण धान की खेती में नुकसान उठाना पड़ा। इस वर्ष कृषक के द्वारा कृषि विभाग के अधिकारियों के सलाह पर कुसुम की खेती को अपनाया गया। जिसमें कम पानी, कम लागत में अधिक लाभ प्राप्त किया जा सकता हैं। कुसुम के पौधें में कांटे होने के कारण मवेशियों द्वारा फसल को नुकसान नहीं पहंुचाया जाता। जिससे फसल की सुरक्षा की चिंता किसानों को नहीं रहती।
कृषक वामन टिकरिहा के द्वारा पशुपालन भी किया जा रहा है, जिसके गोबर एवं गौमूत्र का उपयोग कर जीवामृत, बीजामृत, घनजीवामृत आदि उत्पादों के द्वारा प्राकृतिक खेती किया जा रहा है। वामन टिकरिहा के नवाचार से उन्हें राज्य स्तरीय डॉ. खुबचंद बघेल कृषक रत्न पुरस्कार से सम्मानित किया गया है। कुसुम की फसल को देखकर  जिले के अन्य किसान भी प्रेरित हो रहे हैं, तथा ग्रीष्मकालीन धान के बदले दलहनी, तिलहनी फसलों की खेती की ओर अग्रसर हैं।
उप संचालक कृषि दीपक कुमार नायक ने बताया कि कुसुम की फसल कम पानी में भी सफलतापूर्वक तैयार हो जाती है तथा 150 से 180 दिनों में पककर तैयार हो जाती है, जिससे अधिक लाभ प्राप्त होता है। कुसुम बीज में 25-45 प्रतिशत तक तेल की मात्रा रहती है। इसके अलावा, तिलहनी फसलों को बढ़ावा देने हेतु शासन द्वारा विभिन्न योजनाएं संचालित की जा रही हैं, जिनका लाभ किसान भाई उठा सकते हैं।

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